Talk:Mitti Ke Diye (मिट्टी के दीये)

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This book was formerly dated 1967, with "letters" indicated as the original source material, which info is found in the CD-ROM. A closer reading of the CD-ROM reveals that they are first and most prominently so labelled but, as a sort of subtitle it says, "Collection of lecture talks and stories from his lectures". This aligns better with info found chez Neeten's Osho Source Book, specifically in the Manuscripts section of his Appendix page. Neeten has documented these hand-written notes (not letters) and also their publication in 1966, so info here has been updated. -- doofus-9 (talk) 17:26, 6 March 2015 (UTC)


we have here 59 "lectures", 163/204 pages (4th ed) and app 87 manuscript pages.

i’m a bit confused how Arvind (and subsequent editors) managed to transcribe 87 man. pages into 163 (and even 204) book pages.

the printed book looks rather dense (see Google books)

so maybe the manuscript collection is not complete ? --Rudra (talk) 07:51, 22 November 2015 (UTC)


None of the usual pub info was given in the pub info page that was scanned. Thus, it was tempting to marry the data for the 2008 edition with the new image. In the end it was decided that the cover images are sufficiently different -- though that only a subtle difference in colour -- to keep them as separate editions. Diamond's frequent practice of stickering in a year in the "edition" info was not observed this time around, so not even the year is known. -- doofus-9 07:34, 31 August 2017 (UTC)


Chapter titles given in 2016 edition (source - Shailendra's scan):

अनुक्रम-

01 सागर का संगीत
02 जीवन से बड़ी कोई संपदा नहीं है
03 त्याग का भी त्याग
04 धार्मिक चित्त क्या है? 
05 धर्म मूलतः अभय में प्रतिष्ठा का मार्ग है
06 मनुष्य जैसा होता है वैसा ही उसका धर्म होता है
07 साहस
08 महत्वाकांक्षा का मूल : हीनता का भाव
09 जागो और जीओ! 
10 प्रेम जहां है वहां परमात्मा है
11 ठहरो और रुको और स्वयं में देखो
12 धर्म स्वयं की श्वास-श्वास में है
13 क्या स्वयं जैसे होने का साहस और प्रौढ़ता आपके भीतर है? 
14 धर्म में विज्ञापन की क्या आवश्यकता? 
15 "मैं" एक असत्य है
16 धर्म विश्वास नहीं, विवेक है
17 आंखें होते हुए भी क्या हम अंधे नहीं हो गए हैं? 
18 प्रेम और प्रज्ञा
19 शास्त्रों से पाए हुए ज्ञान का यहां कोई मूल्य नहीं है
20 सावधान और सचेत
21 परमात्मा का छोड़ो, प्रेम को पाओ
22 कुछ होने की महत्वाकांक्षा ही मन है
23 अहंकार के मार्ग बहुत सूक्ष्म हैं
24 जहां चित्त ठहरता है, वहीं शांति है
25 चित्त का त्याग कैसे संभव है? 
26 जीवन बहुत रहस्यपूर्ण है
27 जीवन में कहीं पहुंचने का राज
28 जिनका स्वयं पर राज्य है, वे ही सम्राट हैं
29 धर्म के प्रति उपेक्षा
30 समस्या और समाधान
31 जन्म में ही मृत्यु छिपी है
32 जो छोड़ने का निश्चय करता है, वह कभी नहीं छोड़ता
33 जीवन ही जिसका प्रेम नहीं है, उस जीवन में प्रार्थना असंभव है
34 स्वयं का स्वीकार
35 क्या हम स्वयं को ही अन्यों में नहीं झांक लेते हैं? 
36 जीवन का सत्य प्रतिध्वनियों में नहीं, वरन स्वयं में ही अंतर्निहित है
37 मित्र और शत्रु--सब स्वयं की ही परछाइयां हैं
38 स्वयं की वास्तविक सत्ता की खोज
39 तुम्हारे हाथ भी क्या मेरे ही हाथ नहीं हैं? 
40 विश्वास अज्ञान का समर्थक है और अज्ञान एकमात्र पाप है
41 सत्य है बहुत आंतरिक--आत्यंतिक रूप से आंतरिक
42 "अहंकार" समस्त हिंसा का मूल है
43 अज्ञान मुखर है और ज्ञान मौन
44 धर्म मृत्यु की विधि से जीवन को पाने का द्वार है
45 धर्म जीवन में हो, तभी जीवित बनता है
46 जीवन क्या है? 
47 वह वहीं है और वही है, जहां सदा से है और जो है! 
48 वस्त्र धोखा दे सकते हैं
49 स्वतंत्रता से व्यक्ति सम्राट होता है
50 स्वयं का विवेक
51 जीवन और मृत्यु भिन्न-भिन्न नहीं हैं
52 धर्म भेद नहीं, अभेद है
53 धर्म को किसी भी भांति खरीदा ही नहीं जा सकता है
54 सत्य की खोज में पहला सत्य क्या है? 
55 मृत्यु क्या है? क्या वह जीवन की ही परिपूर्णता नहीं है? 
56 आनंद कहां है? 
57 मृत्यु में ऐसा क्या भय है? 
58 अहंकार जीवन में दीवारें बनाता है
59 प्रार्थना मांग नहीं है
60 अहंकार का भार

--DhyanAntar 17:10, 24 July 2018 (UTC)


Previous edition has 59 stories: by mistake two stories were joined as one in ch.22.
2016 edition has changed sequence of 60 stories. (source - Shailendra).--DhyanAntar 10:20, 23 October 2018 (UTC)