Difference between revisions of "Letter written on 3 Jul 1961 am"

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the morning of  3rd July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
 
This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the morning of  3rd July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
  
 
This letter has more than its share of little hand-written marks: there is a blue number (5) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure of unknown significance. And for good measure there is a not-previously seen small blue tick mark. The salutation is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over a few months previously.
 
This letter has more than its share of little hand-written marks: there is a blue number (5) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure of unknown significance. And for good measure there is a not-previously seen small blue tick mark. The salutation is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over a few months previously.
  
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प्रणाम। रात का अंधेरा टूट रहा है। पूरब से सुबह फूटने लगी है। एक सत्य दीखता है। अंधेरा है, पर सत्ता उसकी नहीं है : कितना ही घना हो पर एक छोटी सी किरण उसकी मृत्यु बन जाती है। वह है अभाव, वह है नकारात्मक : इससे हो कितना ही, बांध वह नहीं पाता है। बांध सके इतना भी ठोस वह नहीं है : बस केवल घेर ही पाता है।
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मनुष्य के चेतना जगत में भी यही सत्य है। सारा अज्ञान एक छोटी सी लौ से बुझ जाता है। एक और बात कि अंधेरा दिये को नहीं बुझा सकता है। दिया बुझ जाए तो अंधेरा आजाता है पर दिये को बुझाकर आने की सामर्थ उसकी नहीं है। दिया जल सकता है और अंधेरे को बुझा सकता है।
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चेतना में भी प्रकाश जग सकता है। उपस्थित तो है ही प्रगट ही होना है। कबीर ने गाया है :
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‘चित चकमक लागै नहीं’ – जगत के चकमक से चित्त नहीं लगता – बस इतनी सी बात है। चकमक मिली कि ज्योति जली। ज्योति सोई है – जरा सा प्रयास कि उसमें जाग आजाती है। थोड़ा ही हिलना है कि प्रभु मिल जाता है। एक कदम – बस एक कदम का ही फासला है। इससे मैं कहता हूँ : उठो। थोड़ा सा चलें। चले कि पाया। उठे कि पाया। बस बैठे रहना ही एकमात्र बाधा है।
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रात्रि में हुई बातों का स्मरण है। कितनी आकंठा – कितनी प्यास आप में है। जागने की कितनी लगन। धड़कन धड़कन में यह प्यास बैहती जारही है। भला लक्षण है। यह प्यास ही एक दिन उठा देगी। उस दिन पायेंगी कि ओह! खोज जिसकी थी वह मिल गया है। दूर जिसे जाना था, निकट ही उपलब्ध होगया है।
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सबको मेरे विनम्र प्रणाम। सुबह आपके ही उठाने से उठ रहा हूँ : कितना आहिस्ता हाथ रखती हैं कि कहीं निंद टूट न जाये!
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बच्चों को स्नेह।
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रजनीश के प्रणाम
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Revision as of 11:24, 15 February 2020

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the morning of 3rd July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

This letter has more than its share of little hand-written marks: there is a blue number (5) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure of unknown significance. And for good measure there is a not-previously seen small blue tick mark. The salutation is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over a few months previously.

Letters to Anandmayee 823.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

प्रभात:
३ जुलाई ‘६१

प्रिय मां,
प्रणाम। रात का अंधेरा टूट रहा है। पूरब से सुबह फूटने लगी है। एक सत्य दीखता है। अंधेरा है, पर सत्ता उसकी नहीं है : कितना ही घना हो पर एक छोटी सी किरण उसकी मृत्यु बन जाती है। वह है अभाव, वह है नकारात्मक : इससे हो कितना ही, बांध वह नहीं पाता है। बांध सके इतना भी ठोस वह नहीं है : बस केवल घेर ही पाता है।

मनुष्य के चेतना जगत में भी यही सत्य है। सारा अज्ञान एक छोटी सी लौ से बुझ जाता है। एक और बात कि अंधेरा दिये को नहीं बुझा सकता है। दिया बुझ जाए तो अंधेरा आजाता है पर दिये को बुझाकर आने की सामर्थ उसकी नहीं है। दिया जल सकता है और अंधेरे को बुझा सकता है।

चेतना में भी प्रकाश जग सकता है। उपस्थित तो है ही प्रगट ही होना है। कबीर ने गाया है :

“पावक रूपी साइयां, सब घट समाई
चित चकमक लागै नहीं, ताते बुझ बुझ जाई।“

‘चित चकमक लागै नहीं’ – जगत के चकमक से चित्त नहीं लगता – बस इतनी सी बात है। चकमक मिली कि ज्योति जली। ज्योति सोई है – जरा सा प्रयास कि उसमें जाग आजाती है। थोड़ा ही हिलना है कि प्रभु मिल जाता है। एक कदम – बस एक कदम का ही फासला है। इससे मैं कहता हूँ : उठो। थोड़ा सा चलें। चले कि पाया। उठे कि पाया। बस बैठे रहना ही एकमात्र बाधा है।

रात्रि में हुई बातों का स्मरण है। कितनी आकंठा – कितनी प्यास आप में है। जागने की कितनी लगन। धड़कन धड़कन में यह प्यास बैहती जारही है। भला लक्षण है। यह प्यास ही एक दिन उठा देगी। उस दिन पायेंगी कि ओह! खोज जिसकी थी वह मिल गया है। दूर जिसे जाना था, निकट ही उपलब्ध होगया है।

सबको मेरे विनम्र प्रणाम। सुबह आपके ही उठाने से उठ रहा हूँ : कितना आहिस्ता हाथ रखती हैं कि कहीं निंद टूट न जाये!

बच्चों को स्नेह।

रजनीश के प्रणाम


See also
(?) - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.