Dhyan Geeta (ध्यान गीता)

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Dhyan Geeta (Songs of Meditation) -- Osho's Teachings in poetry form
This booklet contains songs based on Osho's teachings. They are collectively sung by participants of the DHYAN-SAMADHI Program at OSHODHARA, at the beginning of each session in 6 days.
There are 17 songs, earlier there were 18.
The booklet got reprinted at least 10 times in the last 15 years.
For the music and lyrics, see below.
ध्यान गीता
इस पुस्तिका में ओशो की शिक्षाओं के आधार पर 18 गीत शामिल हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 6 दिनों में, प्रत्येक सत्र की शुरुआत में, ध्यान-समाधि शिविर के प्रतिभागियों द्वारा गाया जाता है, साथ में मा ओशो प्रिया की मधुर आवज में ऑडियो एमपी-3 चलाया जाता है।
author
Songwriter : Sw Anand Siddharth (aka Osho Siddharth, Dr. Virendra Kumar Singh, ओशो सिद्धार्थ)
Music : Sw Dev Geet (Jalil Mohammed)
language
Hindi
notes

editions

Dhyan Geeta small.jpg

ध्यान गीता

Year of publication : 2005
Publisher : Osho Nanak Dhyan Mandir
Edition no. : 1
ISBN  : none
Number of pages : 32
Hardcover / Paperback / Ebook : P
Edition notes :

music album

Artists
Ma Amrit Priya - main singer
Sw Dev Geet (Jalil Mohammed) - main singer
Recorded
2003
Released
2003
Length
2:15:49

Tracks - full length

01 Samyak Khoj (सम्यक खोज) 9:04
lyrics
घर से बाहर सब निकल पड़े, कुछ मंदिर, कुछ मयखाने में।
धन के पीछे कुछ लोग लगे, कुछ पागल कुर्सी पाने में।
अब कौन भला समझाये इन्हें, घर का हीरा दिखलाए इन्हें।
अथ गेहं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

क्या होगा तीरथ जाने से, क्या होगा यज्ञ कराने से?
शास्त्रों को पढ़कर क्या होगा, क्या होगा गंग नहाने से?
मूरत, मस्जिद, देवालय में, क्या रखा कहो हिमालय में?
आत्मानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

चुकता जाता है तेल, और जलती जाती तन की बाती।
रह जाती तब भी रात बहुत, जिन्दगी न खुद को पढ़ पाती।
इसके पहले कि दीप बुझे, खुद की किताब पढ़ ले पगले।
स्वाध्यायं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जीवन को दाँव लगाने का, यदि नहीं हृदय में साहस है।
यदि नहीं ब्रह्म की प्यास जगी, विषयों में ही केवल रस है।
मृत्यु के क्षण पछताओगे, अतृप्त विदा हो जाओगे।
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

माना तुमने भूगोल पढ़ा, माना तुमने इतिहास पढ़ा।
पर अपने जीवन में लिखा जो, क्या तुमने वह पाठ पढ़ा?
यदि नहीं तो फिर कुछ शरमाओ, कुछ गीत जिंदगी के गाओ।
स्वाध्यायं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


02 Samyak Drishti (सम्यक दृष्टि) 8:59
lyrics
जीवन विराट है सागर-सा, हम ऊपर-ऊपर जीते हैं;
घटनाएं हैं लहरों जैसी, हम बहुत अर्थ दे देते हैं।
क्या हुआ जो एक साकी रूठी? क्या हुआ जो एक प्याली फूटी?
अथ अमृत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

सोचो, यदि प्याली ना फूटे, सोचो, यदि साकी ना रूठे;
तो कैसे होश में आएं हम? कैसे अपने घर जाएं हम?
यदि प्यास न थोड़ी हो बाकी, कैसे मुर्शिद मिले साकी?
अथ सद्गुरु शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

बीते का जिसको शोक नहीं, जो वर्तमान में जीता है;
वह पा लेता अपनी मंजिल, उसका जीवन एक गीता है।
पढ़ लेता जो अपनी किताब, पा जाता जीवन का सुराग।
स्वाध्यायं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

माना अस्वीकृति दुखदायी, पर देखो कितना जग विशाल;
फूलों की कोई कमी नहीं, हे भ्रमर, विगत का क्यों मलाल?
फैलाओ पंख उड़ान भरो, कुछ नए गीत, सुर, तान भरो।
अथ नूतन शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो जीवन दुख में पका नहीं, कच्चे घट-सा रह जाता है;
जो दीप हवाओं से न लड़ा, वह जलना सीख न पाता है।
इसलिए दुखों का स्वागत कर, दुख ही मुक्ति का है आकर।
अथ सत्यं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


03 Samyak Jagriti (सम्यक जागृति) 8:52
lyrics
है कौन सही, है कौन गलत, क्या रखा इस नादानी में;
कौड़ी की चिंता करने में, हीरा बह जाता पानी में।
जब भी शिकवा शिकायत हो, जानना तुम्हीं खलनायक हो।
अथ प्रेमं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

मूढ़ों का रस है प्रभुता में, प्रतिभाशाली झुक जाते हैं;
जीवन की ऊर्जा को सज्जन, यूं ही लड़कर न गंवाते हैं।
सीना ताने चलता दुर्जन, नम्रता संत का है लक्षण।
नम्रत्वं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

प्रतिक्रिया कभी हो तो समझो, तुमने घटना को मूल्य दिया;
थी लहर जरा-सी लेकिन तुमने, सागर-सा बहुमूल्य किया।
अब छोड़ो सब प्रतिशोध अहो, करते जाओ अनुरोध अहो।
अनुरोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

संबंध बढ़ाते हो जब-जब, जानना एक दिन टूटेगा;
जो मान दे रहा आज तुझे, वह यार एक दिन रूठेगा।
उस दिन मत तनिक ग़िला करना, कहकर शुक्रिया विदा करना।
भवितव्यं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

तुम क्षमाशील हो क्षमा करो, उनको जो अपराधी तेरे;
तुम भी तो क्षमा चाहते हो, अपराध किए जो बहुतेरे।
प्रतिशोध अग्नि का शमन करो, अब क्षमाशीलता वरण करो।
अथ प्रेमं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


04 Samyak Sambandh (सम्यक संबंध) 7:23
lyrics
गौतम ने कहा-भिक्षुओ सुनो, मन ही सुख-दुख का मूल अहो;
जो है उसका करता न मान, कुछ नहीं मिला तो परेशान।
मन है अशांत तो जो भी करो, आएगा दुःख अनिवार्य अहो।
अथ शांतिं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जैसे चक्का पीछे-पीछे, बैलों के चलता जाता है;
वैसे ही हो यदि मन चंगा, सुख की गंगा ले आता है।
सारा जग है मन की माया, मन से ही धूप, मन से छाया।
प्रमुदित मन शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

लगता होगा यह बहुत बार, कुछ लोग नहीं सुनते तुमको;
घायल हो जाता अहंकार, दुख पागल कर देता मन को।
मत कथा गढ़ो या चिल्लाओ, नूतन अनुरोध किए जाओ।
अनुरोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो नहीं हुआ उसकी खातिर, यदि ज्यादा शोर मचाओगे;
जो है वह भी खो जाएगा, तुम व्यर्थ खड़े पछताओगे।
इसलिए नहीं जो मिला तुम्हें, उसके न लिए हो ग़िला तुम्हें।
सद्भावं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कुछ करो मगर मत जिद्द करो, दुनिया चलती ही रहती है;
अंगद जैसा मत पांव टेक, बाजी उल्टी पड़ सकती है।
कोई न जरूरी दसकंधर, खा जाएगा पथ में ठोकर।
निर्दंभं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


05 Samyak Karm (सम्यक कर्म) 9:31
lyrics
हम अपना लिखते भाग्य स्वयं, पर समय बीत जब जाता है;
ख़ुद का ही लिखा न पढ़ पाते, अक्षर धुंधला हो जाता है।
इसलिए नियति को मत मानो, अपना हस्ताक्षर पहचानो।
दायित्वं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हम जो भी करते कर्म यहाँ, फल पीछे-पीछे आता है।
पुरुषार्थ कालक्रम में पककर, प्रारब्ध अटल बन जाता है।
है रची तुम्हीं ने आत्मकथा, मत कहो विधाता ने लिखा।
पुरुषार्थं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

सोना, सज्जन या साधु-संत, सौ बार टूट जुड़ जाते हैं;
दुर्जन कुम्हार के घट-से दरक गए न कभी मिल पाते हैं।
यदि हो जाओ सोना जैसा, जीवन में फिर रोना कैसा।
निरबैरं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

यदि थोड़ा भी हो रस बाकी, कर पहल दोस्ती कर लेना।
सौ तीरथ जाने से बढ़कर, एक रूठा यार मना लेना।
कहने को कोई हमारा है, तब तक ही यह जग प्यारा है।
अथ मैत्री शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जुगनू जैसे थोड़ा जल-जल, जिंदगी न शोला बनती है;
पूजा, जप, स्तुति से न कभी, धूनी समाधि की जलती है।
साक्षी, प्रज्ञा, हरिनाम बिना, संबोधि मिली कब ध्यान बिना।
अथ ध्यानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


06 Samyak Vani (सम्यक वाणी) 7:49
lyrics
हीरा को हीरा कहने से, पत्थर पत्थर रह जाता है।
कंकड़ को कंकड़ कहो अगर, वक़्ता कंकड़ हो जाता है।
इसलिए श्रेष्ठ की प्रिफक करो, मत लघुताओं का जिक्र करो।
अथ श्रेष्ठं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

चंदन, बेला, जूही या कमल, कितने सुरभित, कितने सुन्दर!
पर सुरभि अनूठी, जिसके जीवन में खिलता है शील-कमल।
भीतर-बाहर का भेद नहीं, वह जो बोले है वेद वही।
अथ शीलं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

मनसा, वाचा, कर्मणा कभी, कटुता जीवन में मत लाओ।
सबका मंगल सोचो प्रतिपल, मंगल के गीत सदा गाओ।
सबसे मीठी वाणी बोलो, सबसे प्यारा नाता जोड़ो।
अथ मंगल शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

यदि हृदय प्रेम से भरा, अधर पर कैसे फिर गाली होगी?
मन में कड़वाहट भरी अगर, मीठी कैसे वाणी होगी?
इसलिए न विष का जिक्र करो, बस अमृत की तुम फिक्र करो।
अथ अमृत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कहने वाले की बात सुनो, फिर कहो कि क्या तुमने समझा।
जब लगे कि वह सुन रहा प्रेम से, तब ही पक्ष रखो अपना।
पहले समझो, फिर समझाओ, यह सूत्र शील का अपनाओ।
संवादम शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


07 Samyak Sankalp (सम्यक संकल्प) 8:46
lyrics
जब भी बाधा आए पथ में, उसको सोपान बना लेना।
अपमान करे कोई, शिव-सा विषपान बना लेना।
मत कभी शोक या मोह करो, हो कृत्य कोई तुम योग करो।
अथ योगं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो टूट गए संकल्प कभी, फिर से उनका उद्धार करो।
जो साथी पथ में रूठ गए, उनसे फिर आँखें चार करो।
तुम पहल करो, आलस छोड़ो, टूटे संबंधों को जोड़ो।
प्रतिबद्धं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हो मार्ग कहीं अवरूद्ध अगर, कुछ नूतन राह तलाश करो।
बहती दरिया से कुछ सीखो, सम्यक रह सतत प्रयास करो।
हर शिला खड़ी रह जाती है, सरिता आगे बढ़ जाती है।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

निष्ठापूर्वक निज कर्म करो, जग को जो भाए कहने दो।
हाथी-सा तुम मदमस्त चलो, कुत्ते भूंकते हैं भूंकने दो।
निष्ठा की आग न छुपती है, संकल्प नदी कब रुकती है?
अथ निष्ठा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

बेहतर होगा तुम लिख डालो, अपने जीवन का संविधान।
संकल्प सहित पालन करना, अब शेष रहे या जाए प्राण।
जो रहता है संकल्पहीन, उसका जीवन है अर्थहीन।
संकल्पं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


08 Samyak Sweekar (सम्यक स्वीकार) 7:08
lyrics
संसारी हो या साधक हो, फल की आकांक्षा बाधक है;
उद्देश्य कर्म का पूरा हो, यह तो न सदा आवश्यक है।
जो हुआ, मील का है पत्थर, योगी बढ़ता आगे पथ पर।
अथ योगं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कुछ होता है अनुकूल यहाँ, कुछ होता है प्रतिकूल यहाँ;
हम व्यर्थ पात से कंपते हैं, कुछ फूल यहाँ, कुछ शूल यहाँ।
लहरों को बनने-मिटने दो, भीतर चैतन्य न कंपने दो।
निष्कंपं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जब भी तुम ठोकर खाते हो, प्रतिशोध छलककर आता है;
पर नहीं शिकायत हो मन में, तब ही जानना तथाता है।
जिसके दिल में न शिकायत है, वह दिल कुरान की आयत है।
अशिकायत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो रहता अपनी मस्ती में, जिन्दगी बोध की गीता है;
निष्काम और निरअहंकार, जो धन्यवाद में जीता है।
वह बोधिसत्व है, वंदित है, उसका बुद्धत्व सुनिश्चित है।
संबोधिं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

अब गाओ गीत तथाता के, पांवों में घुंघरु बंधने दो;
नाचो हे नटनागर नटवर, बांसुरी शून्य की बजने दो।
स्वीकार भरा यदि जीवन है, हर गाँव-नगर वृन्दावन है।
कृष्णत्वं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


09 Paramatma (परमात्मा) 8:38 - अष्टांग योग / अजपा समाधि
lyrics
मंदिर-मस्जिद में सीस झुका, तुम जिसको सजदा करते हो।
भीतर पुकारता कब से वह, आवाज नहीं क्यों सुनते हो?
है नाम बिना निस्तार नहीं, प्रियतम बिन होता प्यार नहीं।
अथ अनहद शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

सबके भीतर प्रभु बैठ स्वयं, है चला रहा सबकी मशीन।
आश्चर्य सभी हैं देख रहे, फिर भी न कोई करता यकीन।
यह अंधों का है गाँव अरे, हम कहाँ दिखाएं राम अरे?
अथ रामं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

धुंधली हो गई नजर हो तो, ऐनक अपनी कुछ साफ करो।
सब आँखों से वह झाँक रहा, हर हाथ उसी का हाथ अहो।
वह दिग-दिगंत से गाता है, सुन लो यदि सुनना आता है।
अथ श्रवणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

गंगा तट पर सब खड़े हुए पर पूछ रहे हैं गंग कहाँ?
है नामपट्ट पर नजर टिकी, कोई लिख दे है गंग यहाँ।
तुम जहाँ कहो मैं वहीं लिखूं, पर किस भाषा में हरि लिखूं?
अथ नादं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

भीतर भी वही गूंजता है, बाहर भी वही गूंजता है।
अनहद में है वह निराकार, कोयल बन वही कूंजता है।
है ओंकार का ख्याल जिसे, क्या कर पाएगा काल उसे।
अथ नादं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


10 Karmyog (कर्म योग) 7:50 - योग क्या है?
lyrics
कर्मस्थल बन जाए मंदिर, घर को आश्रम बन जाने दो।
हर साँस बोध के साथ चले, हर बात भजन बन जाने दो।
गुरु साकी तू पीनेवाला, जीवन बन जाए मधुशाला।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जिन्दगी एक सीता-सी है, संसार भयानक कानन है;
पल भर जो प्रहरी दूर हुआ, हरने को खड़ा दशानन है।
इसलिये स्वर्णमृग मत मांगो, लक्ष्मणरेखा को मत लांघो।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

तन से हो या कि मन से हो, हो साक्षी की निगरानी में।
वरना तुम जो भी करते हो, जुड़ जाता आनी-जानी में।
साक्षी होकर सब कर्म करो, है यही सनातन धर्म अहो।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कर्मों की आपाधापी में, तुम होश नहीं अपना खोना।
अनुकूल हुआ तो मत नाचो, प्रतिकूल हुआ तो मत रोना।
है नहीं कृत्य कोई महान, है किया होश में मूल्यवान।
अथ ध्यानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

तुम कर्म करो लेकिन सोचो, जो भी होगा अच्छा होगा।
वह आज भले प्रतिकूल लगे, कल निश्चय ही अच्छा होगा।
जग का जो भी है निर्माता, मंगल की ओर लिए जाता।
भवितव्यं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


11 Tantrayog (तंत्र योग) 7:09
lyrics
साकी रख गई भरी बोतल, है जाम सजा मेरे आगे।
सब रिंद जमा हो पूछ रहे, जो आया भोगें या त्यागें।
मैं कहता बस अब पीता जा, बस जाग जरा और जीता जा।
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

तू बना फकीरा वेश जगत का देख तमाशा साक्षी बन।
आनंद सहित स्वीकार करो, प्रभु पिला रहा है साकी बन।
क्यों प्याज छीलता है मुल्ला, रब परस रहा जब रसगुल्ला।
आनंदं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

पीने को जब भी जाम उठा, प्याले का हरदम होश रहे।
मंजिल पाकर भी कुछ आगे चलने का भीतर जोश रहे।
पल भर की मूर्च्छा जीवन में, सीता लुट जाती है वन में।
अमूर्च्छा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो नहीं काम में उतर सका, निष्काम भला वह क्या होगा।
जिसने न कभी भी प्रेम किया, भगवान भला वह क्या होगा।
है काम राम का द्वार अहो, राधा बिन कैसा श्याम कहो।
निष्कामं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कल की हम बात करें कैसे, क्या पता कि कल क्या मौसम हो।
हों कौन रिंद पीने वाले किसकी क्या खुशियाँ, क्या गम हो।
इसलिए आज जी भर के पी, बस अभी यहीं जी भर के जी।
अथ अद्यं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


12 Hathyog (हठ योग) 5:50 - विपस्सना ध्यान
lyrics
सब एक साल में एक बार होली का पर्व मनाते हैं।
योगी सालों भर मस्ती का गुलाल-अबीर उड़ाते हैं।
साँसो का लेकर इकतारा, मस्ती का गीत सुना प्यारा।
आनंदं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

सूर्योदय से पहले घंटे भर, साधक नियमित चला करे।
रात्रि में सोने से पहले, चक्रमण घड़ी भर किया करे।
बल, बुद्धि, वीर्य बढ़ता इससे, साधक निरोग रहता इससे।
निर्व्याधिं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हर आती साँस जनम नूतन, हर जाती साँस मौत का क्षण।
दोनों के मध्य ठहर जाओ, तो काहे का फिर जन्म-मरण?
है आदि नहीं, है अंत नहीं, वह अलख निरंजन सत्य तुम्हीं।
अथ शाश्वत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जाती साँसें गहरी हों तो, जीवन अमृत बन जाता है।
आती साँसें लंबी हों तो, आनंद मधुर छा जाता है।
शांति से पुलक जो आता है, आनंद वही कहलाता है।
आनंदं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हर साँस राम-सागर से लहरों जैसी उठने-गिरने दो।
साँसों की माला से साक्षी को हरि का नाम सुमिरने दो।
हर वृत्ति लहर बन जाने दो, साक्षी सुमिरन बच जाने दो।
अथ मौनं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


13 Bhakti yog (भक्ति योग) 7:02
lyrics
जग कहता उसको दुश्चरित्र, जो प्यार किसी से करता है।
और सच्चरित्र कहता उसको, जो रूखा-सूखा रहता है।
नासमझों का यह गाँव अरे, आ चलें जहाँ सद्भाव अरे।
सद्भावं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

मत सुनो शेख की, पंडित की, तुम अपने दिल का गीत सुनो।
कुछ कहो हालेदिल रहबर से, जो कहे तुम्हारा मीत सुनो।
मत गीता, ग्रंथ, कितेब पढ़ो, ढाई आखर का वेद पढ़ो।
अथ श्रवणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

चाहे तैरा हो सप्त सिंधु, चाहे गौरी शंकर जीता।
डूबा जो न प्रिय की आँखों में, उसका जीवन यूं ही बीता।
जो समझ न पाया आँखों से, वह क्या समझेगा बातों से।
अथ दृष्टि शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

यदि हाथ चाहते ईश्वर का, पहले दिलवर का हाथ गहो।
मन से मन का स्पर्श करो, आत्मा से आत्मा को छू लो।
जब गहन प्रेम में जाओगे, हर हाथ उसी का पाओगे।
स्पर्शं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

है जहाँ प्रेम है धर्म वहीं, हर प्रेयसि राधा रानी है।
हर प्रेमी ब्रज का कृष्ण और गीता हर प्रेम-कहानी है।
जिसने न कभी है प्रेम किया, उसने यह जीवन व्यर्थ जिया।
अथ प्रेमं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


14 Gyan yog (ज्ञान योग) 7:37
lyrics
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में, जा कब तक शीश झुकाओगे?
कब तक रामायण, गीता से, अपने मन को बहलाओगे?
कब खुद को शीश झुकाओगे, कब खुद गीता बन जाओगे?
आत्मानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

शास्त्रों को पढ़कर क्या होगा? शब्दों को रटकर क्या होगा?
जब तलक शेष है राग-द्वेष, जब तलक वासना, मोह शेष।
जब तलक धर्म अचारण न हो, तबतलक न कोई श्रमण अहो।
आचरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

है काम, क्रोध, मद, लोभ लहर, ईर्ष्या, विद्वेष, विमोह लहर।
हर विदा लहर, हर मेल लहर, धन, योवन का सब खेल लहर।
लहरों को जिसने पहचाना, उसने ही सागर को जाना।
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

साक्षी धूनी बन जाने दो, ईर्ष्या-विद्वेष करो स्वाहा।
आनंद-धूप का धुआँ उठे, खुशबू बनकर निकले आहा।
कुछ ऐसा ध्यान-दीप बारो, घर आ जाएं धाम चारों।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कामना छोड़ वासना छोड़, कल्पना छोड़कर जाग अभी।
जो है उसका स्वीकार करो, अन्यथा हेतु मत भाग कभी।
छोड़ो तृष्णा विश्राम करो, साक्षी होकर आराम करो।
विश्रामं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


15 Dhyan yog (ध्यान योग) 7:15
lyrics
कितना आपाधापी धन का, पद, मान, कामिनी, कंचन का।
यह दौड़ कहाँ ले जाएगी, क्या सार यही है जीवन का?
छोड़ो असार अब ध्यान करो, जीवन का कुछ सम्मान करो।
अथ ध्यानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जैसे किसान टूटी छप्पर, वर्षा के भय से छाता है।
वैसे ही राग रोकने को, साधक भी ध्यान लगाता है।
जिसके जीवन में ध्यान घटा, उसका दुख-दारूण, राग कटा।
वीतरागं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

घर-घर में चर्चित काम यहाँ, मंदिर में बंदी राम यहाँ।
मूर्च्छा का आसव पी-पीकर, कुछ लेते हरि का नाम यहाँ।
छोड़ो प्रमाद अब ध्यान करो, कुछ भीतर अनुसंधान करो।
ओंकारं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

जो भी करता है सतत ध्यान, ऊर्जा हो जाती उर्ध्वमान।
भर जाती है गागर उसकी, बन जाती है किस्मत उसकी।
छोड़ो आलस अब ध्यान करो, प्रज्ञाजल से स्नान करो।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

अाँखों के पीछे शून्य गगन में, अपनी साँसें स्वाहा कर।
दुख, शोक, ताप की आहुति दे, तू अभी आह से आहा कर।
सुमिरन से बढ़कर कर्म नहीं, साक्षी से बढ़कर धर्म नहीं।
अथ सुमिरन शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


16 Sankhya yog (सांख्य योग) 7:49 - मैं कौन हूं?
lyrics
कुछ लोग जमा हैं मंदिर में, कुछ लोग जमा मयखाने में।
कुछ उलझ गए हैं पूजा में, कुछ उलझ गए पैमाने में।
मंदिर जाओ या मयखाना, जीवन रह जाता अनजाना।
अथ बोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

यदि देह, इंद्रियाँ, प्राण, हृदय, मन, अहंकार खुद को माना।
यदि नहीं बोध, चैतन्य रूप में खुद को अब तक है जाना।
तो मानुष तन में आए क्यों, जननी को कष्ट दिलाए क्यों?
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

कुछ त्यागों में कुछ भोगों में, कुछ उलझ गए हठ योगों में।
कुछ अतिशय औषधि का सेवन कर उलझ गए बहु रोगों में।
पांडित्य सरीखा रोग नहीं, साक्षीत्व सरीखा योग नहीं।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

यदि बोध तुम्हारा हो गहरा, घर भी आश्रम हो सकता है।
कुछ मूढ़ इकट्ठे हो जाएं, तीरथ मरघट हो सकता है।
यदि समझ विदा हो जाती है, गंगा गंदी हो जाती है।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हो बोध मात्र तेरा परिचय, हो काम एक रहना अकाम।
प्रार्थना एक-‘प्रभु धन्यवाद’, कहना-सुनना बस राम-राम।
कोई तेरा तादात्म्य नहीं, कुछ रूप नहीं, कुछ नाम नहीं।
अथ बोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


17 Sahaj yog (सहज योग) 7:07
अब एक पहेली बूझो तो जानूं तू बड़ा सयाना है।
क्या वस्तु गुरु देता जिसको संतों ने अमोलक माना है।
क्या राम रतन धन मीरा का, गुरु नानक, संत कबीरा का?
ओंकारं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

लज्जा बिन नारी है सूनी, प्रज्ञा के बिना है नर सूना।
हर सेज पिया बिन है सूनी, साधू हरिनाम बिना सूना।
परमात्मा है असली भराव, है नहीं राम बिन कहीं ठाँव।
अथ रामं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

अनहद से कोई जड़-चेतन, कोई गुरु है कोई चेला।
अनहद से धरम-करम सब है, वरना है मूल्य न इक धेला।
अनहद से सूरज जलता है, अनहद से जीवन चलता है।
अथ अनहद शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

सुन लिया कृष्ण की वंशी को, क्या रहा और सुनना बाकी।
पी राम नाम रस लिया अगर, क्या और रहा पीना बाकी।
अब दुनिया से किसलिए आस, हर क्षण चलता है महारास।
अथ उत्सव शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।

हरि स्वयं सृष्टि की वीणा पर अनहद का राग बजाता है।
फिर भी न सुनाई दे जिसको कितना वह मनुज अभागा है।
इस धुन से जिसकी लगन लगी, सच उसकी सहज समाधि जगी।
अथ समाधि शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।


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