Letter written on 12 Feb 1961

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 12th February 1961, on his personal letterhead stationery of the day: The top left corner reads: Rajneesh / Darshan Vibhag (Philosophy Dept) / Mahakoshal Mahavidhalaya (Mahakoshal University). The top right reads: Nivas (Home) / Yogesh Bhavan, Napiertown / Jabalpur (M.P.). Many of his letters on this letterhead have had the number 115 added in by hand before "Yogesh Bhavan" to complete his address, but not this one.

This letter is on two sheets with consecutive file numbers. They have been found together as a single published page (80) in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो), which verifies the text, albeit with some mis-transcriptions. The salutation is the usual "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Of the marks and numbers that have been found in some other letters, the first sheet has only a red tick mark, and the second has a pale blue figure of unknown significance in the top left, similar to some appearing in other letters.

The date, on the bottom of the second sheet, is accompanied, unusually, by a day of the week, Sunday (रविवार, ravivar) instead of a time of day.

Osho suggests travel plan to Ma from Chanda so that she joins him for further travel to Gadarawara on 16th night from Jabalpur. In the 1st para however informs that he is locked in the house due to curfew in the town. He says - sect (organization) is enemy of religion - which is a matter of cognition / realization through 'sadhana'- a function of individual and not organization - man can not be healed unless he is freed of that disease.

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रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग               योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,
पद-स्पर्श। अर्धरात्रि का सन्नाटा। घर में बंद हूँ : नगर में कर्फ्यू है। दंगा लगभग शांत हो गया है पर जनता का मन शांत नहीं है। संप्रदाय धर्म की हत्या के कारण बन गये हैं। यह प्रतीति मेरे मस्तिष्क में स्पष्ट होती जारही है कि जो जितना अधिक सांप्रदायिक है वह उतना ही कम धार्मिक होता है। संप्रदाय धर्म का शत्रु है। मनुष्य को इस रोग से मुक्त किये बिना स्वस्थ नहीं बनाया जासकता है। धर्मानुभूति संगठना का नहीं, साधना का कार्य है। वह मूलत: वैयक्तिक है। उसके लिए समूह बद्ध होना अनावश्यक ही नहीं अनर्थकारी भी है।

***

मैं १६ तारीख की रात्रि १० बजे गाड़रवारा जारहा हूँ। आपको १५ फर. को सुबह चांदा से जिस गाड़ी से मैं निकला था उसी से निकलना चाहिए। नागपुर से २ बजे फास्ट एक्सप्रेस बस मिलती है जो यहां ८ बजे पहुँचा देगी। यदि १५ को न निकल सकें तो १६ को ही निकलें। उस स्थिति में विवाह के बाद फिर मेरे पास रुकना होगा। जैसा भी हो मुझे तार से सूचना कर दें ताकि मैं मोटर स्टैंड पर मिल सकूँ। मैं अपना घर का पता नीचे दे रहा हूँ : योगेश भवन (ब्‍लूम होटल और सैल्स टैक्स आफिस के बीच में) ११५, नेपियर टाउन। यह स्थान मोटर स्टैंड से पांच मिनिट के फासले पर ही है।

***

आपका पत्र बहुत दिनों से नहीं है। कल सुबह या संध्या पाने की आशा करता हूँ। शांता का ६ तारीख का पत्र कल मिला है। कल से ही डाक बंटनी शुरू हुई है। शांता ने लिखा है, "मिलने पर कुछ मांगना है। मिलेगा न!" उसे कहदें : ‘मांगने से दुनिया में कहीं कुछ मिलता है? छीनना पड़ता है! जो भी छीनले मुझसे तो उसका है फिर छीनकर पाई हुई चीज में रस भी होता है!’ उसे जल्दी ही मैं पत्र लिखूँगा।

***

शारदा, बच्चों और नवांगतुक ' अजय’ को स्नेह। सबको प्रणाम।

रजनीश के प्रणाम
रविवार
१२. फर. १९६१

Partial translation
"I will be going to Gadarwara in the night of 16th. You have to start on 15th Feb morning by the same train by which I had departed from Chanda. You will get the fast express bus at 2 o’clock from Nagpur, which will reach here (Jabalpur) at 8 o’clock. If you can not start on 15th then do start on 16th – in that case you will have to stay with me after the wedding. Whatever is the case, inform me by a telegram so that I can meet you at the motor (bus) stand."
...Shanta’s letter of dated 6th was received yesterday."
See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 020 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.