Letter written on 12 Nov 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 12th November 1962. Above the date, Osho notes that it is purnima, full moon.

The letterhead reads (in Devanagari):

Acharya Rajneesh [in a large, messy font to the right of and above the rest below]
Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. There are actually two numbers there, an unreadable one crossed out and replaced by 148.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 70 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 173).

Here the PS reads: "Letter is received. Don't get in to any worry - that which can be taken away (snatched) is not ours and there is also one kingdom within - such that nobody can take it away. Only that belongs to us - we need to keep attention only on that."

Letters to Anandmayee 941.jpg

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

पूर्णिमा
१२ नव. १९६२

प्रिय मां,
एक प्रवचन पढ़ रहा हूँ। कोई साधु बोले है। क्रोध छोड़ने को, मोह छोड़ने को, वासनायें छोड़ने को कहा है। जैसे ये सब बातें छोड़ने की हों – किसी ने चाहा और छोड़ दिया – पढ़ सुन कर ऐसा ही प्रतीत होता है! इन उपदेशों को सुनकर ज्ञात होता है कि अज्ञान कितना घना है। मनुष्य के मन के सम्बंध में धार्मिकों की जानकारी कितनी कम है।

एक बच्चे से एक दिन मैंने कहा कि तुम अपनी बीमारी को छोड़ क्यों नहीं देते हो? वह बीमार बच्चा हंसने लगा और बोला था कि क्या बीमारी छोड़ना मेरे हाथ में है!

प्रत्येक व्यक्ति विकार और बीमारी को छोड़ना चाहता है पर विकार की जड़ों तक जाना आवश्यक है – वे जिस अचेतन गर्त से आते हैं वहां तक जाना आवश्यक है – केवल चेतन मन के संकल्प से उनसे मुक्ति नहीं पाई जासकती है।

एक कहानी फ्रायड ने कहीं कही है। एक ग्रामीण शहर के किसी होटल में ठहरा था। रात्रि उसने अपने कमरे में प्रकाश को बुझाने की बहुत कोशिश की पर असफल ही रहा – उसने प्रकाश को फूंक कर बुझाना चाहा, बहुत शक्ति से फूंका पर प्रकाश था कि अकम्पित ही जलता गया फिर उसने सुबह इसकी शिकायत की थी। शिकायत के उत्तर में उसे ज्ञात हुआ था कि वह प्रकाश दिये का नहीं था जो फूंकने से बुझ जाता – वह प्रकाश तो विद्युत्‌ का था। उसे फूंकना नहीं होता है; उसे बुझाने की बटन होती है।

और मैं कहता हूँ कि मनुष्य के विकारों को भी बुझाने की बटन होती है। वे मिट्टी के दिये नहीं हैं; विद्युत्‌ के दिये हैं! यह विधि अचेतन में छिपी हुई है। चेतन के सब संकल्प फूंकने की भांति व्यर्थ हैं : केवल, अचेतन में ध्यान के माध्यम से उतरकर ही उनकी जड़े टूटती हैं।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: पत्र मिला है। कोई चिंता में न पड़ें – जो छिन सकता है वह अपना नहीं है और भीतर एक बादशाहत भी है कि जिसे कोई भी नहीं छीन सकता है। केवल वही अपनी है : उसपर ही ध्यान रखना है।


See also
Krantibeej ~ 070 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.