Letter written on 13 Nov 1961

From The Sannyas Wiki
Jump to: navigation, search

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 13th November 1961 from Jabalpur (see discussion). The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is just plain "मां" (Maan, Mother or Mom). It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (33) in a circle in the top right corner, a red tick mark, and a second number, assumed to be 59 in the bottom left corner of the back side, which is not seen directly but showing through mirror-image from the back side among the writing on the front. All the letter, somewhat long, is on just the one side, with a PS squeezed sideways on the left side of the page. Osho informs Ma in the PS that program was good at Jaipur (it can also become a good center) and she would be joining him during next visit to Jaipur.

It has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज), as letter #57: edited and trimmed text.

Letters to Anandmayee 859.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

१३ नव. १९६१

मां,
नील आकाश के नीचे सूरज की गरमाहट फैल गई है। सर्दी घनी हो गई है और दूब पर जमे ओस कण बर्फ जैसे ठंडे लगते हैं। दहेलिया के फूलों से ओस की बूंदे टपक रही हैं। रातरानी रात भर सुगंध देकर सो गई है।

एक मुर्गा बांग देता है और फिर दूर दूर से उसके प्रत्युत्तर आते हैं। वृक्ष मलय के झोंकों से कंप रहे हैं और चिडियों के गीत बंद ही नहीं होते हैं।

सुबह अपने हस्ताक्षर सब जगह कर देती है। सारा जगत्‌ अचानक कहने लगता है कि सुबह हो गई है!

मैं बैठा दूर वृक्षों में खो गये रास्ते को देखता हूँ। धीरे धीरे राह भरने लगती है और लोग निकलने लगते हैं। वे चलते हैं पर सोये से लगते हैं। किसी आंतरिक तंद्रा ने सबको पकड़ा हुआ है। सुबह के इन आनंद क्षणों के प्रति वे जागे हुए नहीं लगते हैं : जैसे कि उन्हें ज्ञात ही नहीं कि जो जगत के पीछे है : वह इन क्षणों में अनायास प्रगट होजाता है।

जीवन में कितना संगीत है और मनुष्य कितना बधिर है!

जीवन में कितना सौंदर्य है और मनुष्य कितना अंधा है!

जीवन में कितना आनंद है और मनुष्य कितना संवेदन-शून्य है!

उस दिन अभी जयपुर में आमेर की पहाडियों पर गया था। उन सुंदर पर्वत पंक्तियों में हम देर तक रुके थे पर जो मेरे साथ थे वे जीवन की दैनंदिन क्षुद्र बातों में ही लगे रहे थे। उन सब बातों में जिनका कोई अर्थ नहीं, जिनका होना, न होना बराबर है। इन बातों की ओट ने उन्हें उस पर्वतीय संध्या के सौंदर्य से वंचित कर दिया था। इस तरह क्षुद्र में आवेष्टित हम विराट से अपरिचित रह जाते हैं : जो निकट ही है, वह अपने ही हाथों दूर पड़ जाता है।

मैं कहना चाहता हूँ : ओ मनुष्य! तुझे खोना कुछ भी नहीं है सिवाय अपने अंधेपन के और पा लेना है सबकुछ। अपने हाथों बने भिखारी! आंखें खोल। पृथ्वी और स्वर्ग का सारा राज्य तेरा है।

रजनीश के प्रणाम

(पुनश्च: पत्र और चित्र मिल गए हैं। काविताएं खुब मीठी लगीं। पारखजी का पत्र भी मिला : उन्हें और सारे परिवार को मेरे प्रणाम कहें। जयपुर कार्यक्रम अच्छा रहा : वह भी एक अच्छा केन्द्र बन सकता है। जयपुर में आपकी याद बनी रही; अगली बार तो आप साथ होने को हैं ही। शेष शुभ।)


See also
Krantibeej ~ 057 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.