Letter written on 15 Sep 1963

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 15th September 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the left of and oriented 90º to the rest, which reads:

115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. Of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark is seen up top, and bottom right has a faint but readable mirror-image number, 200, as well as other marks which have been crossed out. The ink used in this letter is entirely black.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 243 (2002 edition).

While concluding the letter Osho writes: "I am in bliss. Letter is received. It is difficult to come on 2nd October. (In her letter Ma would have invited Osho to Chanda on 2nd Oct.) I will be coming only in the end of October. I am going to talk at Jalgaon on 21 and 22 Sep - will start by Calcutta Mail (for Jalgaon) in the evening of 20 Sep. Nothing is decided about Multai (Dist. Betul M.P.) - when finalized I will write. Love and pranam to all. Rajneesh Ke Pranam"

आचार्य रजनीश

११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र:)

१५/९/६३

मां,

कोई कह रहा था : ‘सत्य को जानने के पूर्व ज्ञान आवश्यक है।‘

यह भ्रांति अनेकों को है। ऐसा ज्ञान शब्द संग्रह से अधिक क्या होग? संग्रह अहं तृप्ति देता है। लगता है : मैं कुछ हूँ। ‘मैं’ सबल होता है। और ‘मैं’ ही तो सत्य के आगमन में बाधा है!

फिर, शब्द ज्ञान नहीं है। मृत शब्द ज्ञान कैसे होंगे? शब्द सूचनायें हैं। इन्हें ज्ञान समझ लेना आत्म-वंचना है।

ज्ञान संवादित नहीं होता है। कोई दूसरा उसे किसी दूसरे को नहीं देसकता है। वह अहस्तांतरणीय है। उसे स्वयं ही और सीधा साक्षात्‌ करना होता है।

वह अनुभूति परोक्ष नहीं है। उसमें कोई माध्यम नहीं होसकता है। वह है अ-परोक्ष। स्वयं में, स्वयं को और स्वयं के द्वारा वह होती है।

इससे शब्द का कोई प्रश्न ही नहीं है। शास्त्र उसतक पहुँचाते नहीं; शायद, बाधा ही बनते हैं। इसलिए, सत्य के पूर्व ज्ञान की कोई संभावना नहीं है।

सत्य और ज्ञान युगपत्‌ घटित होते हैं। सत्य के सामने होना ही ज्ञान है।

xxx

मैं आनंद में हूँ। पत्र मिला है। २ अक्तूबर तो आना मुश्किल है। मैं अक्तूबर के अंत में ही आउँगा। २१ और २२ सित. जलगांव बोल रहा हूँ। २० सित. की संध्या कलकत्ता मेल से निकलूंगा। मुल्ताई का अभी तय नहीं हुआ है : तय होते ही लिखूंगा।

सबको प्रेम और प्रणाम।

रजनीश के प्रणाम

Letters to Anandmayee 907.jpg


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 154 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.