Letter written on 16 May 1963 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written in the afternoon of 16th May 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark, a red tick mark and a faint, not quite readable mirror-image number in the bottom right corner, which looks sort of like 183. In addition, there are other marks in that area which are unreadable, which may be crossed out. This letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 218.

The PS reads: "I am happy and sound. Today I am going to Gadarwara and intend to stay for a week there. Convey my pranam to all."

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर : १६ मई १९६३

प्रिय मां,
मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है : यह जानना कि ‘वह’ नहीं है! ‘मैं’ नहीं है : यह बोध सबसे बड़ा ज्ञान है। यह खोना दीखता है पर यही वास्तविक और एकमात्र पाना है।

‘मैं’ समस्त आकांक्षा-वासना का मूल है। वह संसार है। वही ‘मोक्ष’, ‘निर्वाण’ और ‘ब्रह्म’ पाने के पीछे भी होता है! और यहीं भूल हो जाती है। ‘मैं’ सत्य को नहीं पासकता है। वरन्‌ वही रुकावट है। उसका न होना मोक्ष है, निर्वाण है। उसे न भी नहीं किया जासकता है। कौन उसे न करेगा? क्या वही? फिर तो न करने में भी वही पुष्ट होता है। वह जीत भी उसी की जीत है। इसलिए, अहं-शून्यता लाई नहीं जासकती है। उस दिशा में सब लाना – सब पाना – सब पैदा करना – आत्म वंचना है। अहं शून्यता आती है। ‘मैं’ के प्रति जागरण से – ‘मैं’ के सूक्ष्म मार्गों से परिचित होने से – होश से वह आती है। ‘मैं’ को देखने से – दैनंदिन कार्यो में, इच्छाओं में, प्रतिक्रियाओं में, समस्त कार्यो में – व्यापारों में उसके प्रति विवेक-जागरण से वह गलता और गिर जाता है। उसकी सत्ता नहीं है यह दीख जाता है। यह स्थिति सबसे बड़ा उद्‌घाटन है। यह धार्मिक क्रांति है। ‘मैं’ से छलांग सत्ता में उतरना है।

इसलिए, धर्म के जगत्‌ में कुछ पाने जैसा नहीं है। सीधा खींच लाने जैसा वहां कुछ भी नहीं है। क्योंकि वहां ‘मैं’ और उसके आक्रमण की कोई संभावना नहीं है।

‘मैं’ जब नहीं होता है तब ‘जो है’ वह उस उस रिक्ताता में अपने आप उतर आता है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मैं सकुशल हूँ। आज गाडरवारा जरहा हूँ और वहां एक सप्ताह रुकने का इरादा है। सबको मेरे प्रणाम कहें।

Letters to Anandmayee 889.jpg


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 134 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.