Letter written on 18 Apr 1963 xm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written around midnight on 18th April 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. It has a couple of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark and a faint but readable mirror-image number in the bottom right corner, 181. This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 38 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 216.

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,

‘समाधि क्या है?’

किसी ने कहा है : बूंद का सागर में मिल जाना।

किसी ने कहा है : सागर का बूंद में उतर जाना।

मैं कहता हूँ : बूंद और सागर का मिट जाना। जहां न बूंद है, न सागर है, वहां समाधि है। जहां न एक है, न अनेक है, वहां समाधि है। जहां न सीमा है, न असीम है, वहां समाधि है।

समाधि सत्ता के साथ ऐक्य है।

समाधि सत्य है। समाधि चैतन्य है। समाधि शांति है।

‘मैं’ समाधि में नहीं होता हूँ; वरन्‌ जब ‘मैं’ नहीं होता है तब जो है वह समाधि है।

और शायद, यह मैं जो कि ‘मैं’ नहीं है वास्तविक मैं है।

‘मैं’ की दो सत्तायें हैं : अहम्‌ और ब्रह्म। अहम्‌ वह है जो मैं नहीं हूँ पर जो मैं जैसा भासता है। ब्रह्मं वह है जो मैं हूँ लेकिन जो मैं जैसा प्रतीत नहीं होता है।

चेतना – शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है।

मैं शुद्ध साक्षी-चैतन्य हूँ पर विचार-प्रवाह से तादात्म्य के कारण यह दिखाई नहीं पड़ता है। विचार स्वयं चेतना नहीं है। विचार को जो जानता है वह चैतन्य है। विचार का भी जो दृष्टा है वह चैतन्य है। विचार बिषय है; चेतना बिषयी है। बिषय से बिषयी का तादात्म्य्‌ मूर्च्छा है। यही असमाधि है। यही प्रमत्त अवस्था है।

विचार-बिषय के अभाव में जो शेष है वही चेतना है। इस शेष में ही होना समाधि है।

विचार शून्यता में जागरण सत्ता के द्वार खोल देता है। वहीं ‘जो है’ उसका साक्षात्‌ है।

इसमें जागो – यही समस्त जाग्रत पुरुषों की वाणी का सार है।

अर्धरात्रि :
१८ अप्रेल १९६३

रजनीश के प्रणाम

Letters to Anandmayee 887.jpg


See also
Krantibeej ~ 038 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.