Letter written on 18 Oct 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. Letter written on 18th October 1962 (discussion). The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (138) and replaced by a pink number, 140. Also in the upper corner beside the tick mark is a small circular ink spot, of uncertain meaning and significance, not seen before in other letters.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 106 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 165). There (Bhavna) the date is represented as 28 Oct, see discussion.

Letters to Anandmayee 932.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
एक मुर्गा बोल रहा है : सुनता हूँ।

एक गाड़ी मार्ग से जा रही है : देखता हूँ।

सुनना है, देखना है और बीच में कोई शब्द नहीं है। शब्द सत्ता से तोड़ देता है। शब्द सत्य के सम्बंध में है, सत्य नहीं है। सत्य तक शब्द से नहीं, शब्द खोकर पहुँचना होता है।

और शब्द खोना समाधि है। लेकिन केवल शब्द खोना मात्र समाधि नहीं है। शब्द तो मूर्च्छा में भी खो जाते हैं : सुशुप्ति में भी खोजाते हैं : शब्द खोकर भी जाग्रत, चेतन और प्रबुद्ध बने रहना समाधि है।

यह एक साधु से कह रहा हूँ। वे तल्लीनता और मूर्च्छा को समाधि मानते रहे हैं। यह भ्रम बहुतों को रहा है। यह भ्रम बहुत घातक है। इस भ्रम से ही पूजा और भक्ति और मूर्च्छित होने के बहुत से उपाय प्रचलित हुए हैं। वे सब उपाय पलायन हैं और उनका उपयोग मादक द्रव्यों से भिन्न नहीं है। उनमें व्यक्ति अपने को भूल जाता है। इस भूलने, इस आत्म विस्मरण से आनंद का आभास पैदा होता है पर योग आत्म विस्मरण नहीं, पूर्ण आत्म स्मरण चाहता है।

मैं जब परिपूर्ण रूप से जागता हूँ तब मैं परिपूर्ण रूप से होपाता हूँ। यह जागना शब्द से, विचार से, मन से मुक्त होने से होता है। इस जाग्रति में, इस शब्द शून्य चेतना में, ‘मैं’ मिट जाता है। पर मैं नहीं मिटता हूँ। वरन्‌ ‘मैं’ के मिट जाने पर, अहं बोध के मिट जाने पर मैं परिपूर्णतया होआता हूँ।

१८.१०.६२

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: उस रात्रि सकुशल आगया था। स्वास्थ्य आपका अब बिल्कुल ठीक होगा ऐसी आशा करता हूँ। सबको मेरे विनम्र प्रणाम कहें।


See also
Krantibeej ~ 106 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.