Letter written on 1 Mar 1961 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. Text of main part of the letter was written around midnight on 28th February 1961 and PS's was written 1 March 1961 in the morning, although Osho consciously stated 29 Feb 1961 (this is not leap year, see discussion), on his personal letterhead stationery of the day: The top left corner reads: Rajneesh / Darshan Vibhag (Philosophy Dept) / Mahakoshal Mahavidhalaya (Mahakoshal University). The top right reads: Nivas (Home) / Yogesh Bhavan, Napiertown / Jabalpur (M.P.). Many of his letters on this letterhead have had the number 115 added in by hand before "Yogesh Bhavan" to complete his address, but not this one.

This letter does not have Osho's usual salutation, "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, but instead "पूज्य मां", Pujya Maan, Venerable Mother. It lacks most of the marks found on most earlier letters, except that it has a small group of pale blue marks in the top middle part of the letter whose meaning and import is not clear. Layout of second sheet is headed with the word "पुनश्च", punashch, "Postscript", followed by two sections: 1st section of PS is for 'Padam' and 2nd for 'Fadke Guruji'. From what is written to both of them in PS also, it becomes clear that Osho is referring to visit of Ma and Padam at Gadarwara for the wedding (on 18 & 19 Feb) - in continuation with first part of letter.

Sheet with PS has a small group of pale blue, non-circled marks in the top middle part of the letter whose meaning and import is not clear. These marks do not resemble marks found previously, but they are similar to marks on first sheet.

It has been published in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो), p 82 & 81 (Diamond 2002 edition).

Letters to Anandmayee 799.jpg

रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

निवास:
योगेश भवन, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

पूज्य मां,
पद-स्पर्श और प्रणाम। आशीष पत्र आज मिला। साथ बीते थोडे से दिन उसके साथ वापिस लौट आये हैं : मन स्मृति की सुगंध से भर गया है। आपने मेरे भविष्य के निर्विघ्न होने की प्रार्थना की है। आपकी प्रार्थना है तो वह तो पूरी होगी ही। प्रभु तो देने को तैयार है : मांगना भर आने की बात है। जहां तक मेरी बात है, मैं निश्चिंत हूँ। इस निश्चिंत स्थिति पर कभी मुझे ही हैरानी होआती है। जगत् अभिनय दिखता है। उससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह अभिनय ठीक से हो ले इतनी ही बात है। वह होगा यह मैं जानता हूँ। आपके मिलने से यह और भी स्पष्ट होकर अन्तर्मन पर उभर आया है। प्रार्थना करें मेरे लिए – वैसे वह हर क्षण आपकी आंखों में भरी है; अनेक बार झांकते ही वह दीख आई है – पूरी वह होगी यह में असंदिग्‍ध होकर जानता हूँ। मैं जो नहीं मांग सकता था – अभिमानी जो हूं! – उसे मांगनेवाला प्रभु ने मेरे लिए जुटा दिया है।

शेष शुभ है। सबको मेरे प्रणाम। अरविंद, शशि और क्रांति सब आपको प्रणाम भेज रहे हैं।

रजनीश के प्रणाम

अर्धरात्रि २८.२.६१


Letters to Anandmayee 798.jpg

रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

निवास:
योगेश भवन, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

पुनश्च:
पदम को—
प्रिय पदम। बहुत बहुत स्नेह। मैंने जो कहा था, याद है न? मां की आंख के लिए फिक्र करना। जो दवा वे निश्चित करें, नियमित रूप से दे देना। उनके स्वास्थ्य को सदा के लिए ऐसा ही बनाए रखना है। बहुत काम उनके शरीर से अभी होने को हैं। बच्चों को मेरा प्रेम पहुँचा देना। शांति लाल का बहुत स्मरण आता है। उसे कहना : मैं भी उसे कभी याद आता हूं?

फड़के गुरुजी को—
प्रणाम। मां यहां थी तो आपके संबंध में आये दिन बातें होती रही हैं। मेरा मन भी आपकी तरफ खूब झुका हुआ है। लगता है भविष्य में साथ रहना लिखा है। आपकी भी इच्छा यही है। प्रभु ने चाहा तो वह जल्दी ही पूरी हो जाने को है। शेष शुभ। क्या कर रहे हैं : लिखें।

रजनीश के प्रणाम

प्रभात
२९.२.६१

See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 021 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.