Letter written on 23 Oct 1962 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written in the morning of 23rd October 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (140) and replaced by a pink number, 142.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 90 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 167).

Letters to Anandmayee 935.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
मैं अंगुलियों पर गिनी जासकें, इतनी बातें कहता हूँ :
एक – मन को जानना है – जो इतना निकट है फिर भी इतना अज्ञात है;
दो – मन को बदलना है – जो इतना हठी है पर परिवर्तित होने को इतना आतुर है;
और, तीन – मन को मुक्त करना है – जो पूरा बन्धन में है किन्तु अभी और यहीं मुक्त होसकता है।

ये तीन बातें भी कहने की हैं करना तो केवल एक ही काम है। वह है : मन को जानना। शेष दो उस एक के होने पर अपने आप होजाती हैं। ज्ञान ही बदलाहट है, ज्ञान ही मुक्ति है।

यह कल कहता था कि किसी ने पूछा : यह जानना कैसे हो?

यह जानना जागने से होता है। शरीर और मन दोनों की हमारी क्रियाएं मूर्च्छित हैं। प्रत्येक क्रिया के प्रति जागना आवश्यक है। मैं चल रहा हूँ : मैं बैठा हूँ या में लेटा हूँ : इसके प्रति सम्यक्‌ स्मरण चाहिए। मैं बैठना चाहता हूँ इस मनोभाव या इच्छा के प्रति भी जागना है। चित्त पर क्रोध है या क्रोध नहीं है; इस स्थिति को भी देखना है। विचार चल रहे हैं या नहीं चल रहे हैं : उनके प्रति भी साक्षी होना है।

यह जागरण दमन से या संघर्ष से नहीं हो सकता है। कोई निर्णय नहीं लेना है; सद्-असद के बीच कोई चुनाव नहीं करना है। केवल जागना है : बस जागना है और जागते ही मन का रहस्य खुल जाता है। मन जान लिया जाता है और केवल जानने से परिवर्तन हो जाता है और परिपूर्ण जानने से मुक्ति हो जाती है।

इससे मैं कहता हूँ कि मन की बीमारी से मुक्ति आसान है क्योंकि यहां निदान ही उपचार है!

प्रभात:
२३.१०.६२

रजनीश के प्रणाम


See also
Krantibeej ~ 090 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.