Letter written on 25 Sep 1962 (Anandmayee)

From The Sannyas Wiki
Jump to: navigation, search

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 25th September 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a red tick mark in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (135) and replaced by a pink number, 137.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 109 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 161: PS has been omitted).

Osho writes in PS: "Received your letter. Knowing that you can become angry - I feel the happiness!"

Letters to Anandmayee 929.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

२५.९.‘६२

प्रिय मां,
“जीवन का आदर्श क्या है?”

एक युवक ने पूछा है।

रात्रि घनी होगई है और नहाये-नहाये तारों से आकाश भरा है। हवाओं में आज सर्दी है : शायद कोई कहता था कि कहीं ओले पड़े हैं। राह निर्जन है और वृक्षों के तले घना अंधेरा है।

और इस शांत शून्य-घिरी रात्रि में जीना कितना आनंद है। होना मात्र ही कैसा आनंद है! पर हम होना ही भूल गये हैं। जीवन कितना आनंद है पर हम मात्र जीना नहीं चाहते हैं हम तो किसी आदर्श के लिए जीना चाहते हैं! जीवन को साधन बनाना चाहते हैं जो कि स्वयं साध्य है! यह आदर्श की दौड़ सब विषाक्त कर देती है। यह आदर्श का तनाव सब संगीत तोड़ देता है।

बादशाह अकबर ने एक बार तानसेन से पूछा था : ‘तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं गा पाते हो – उनमें कुछ अलौकिक दिव्यता है?’ उत्तर में तानसेन ने कहा था : “वे केवल गाते हैं – गाने के लिए गाते हैं और मैं – मेरे गाने में उद्देश्य है।”

किसी क्षण केवल जीकर देखो। केवल जिओ – जीवन से लड़ो मत : छीना-झपटी न करो। चुप होकर देखो : क्या होता है। जो होता है उसे होने दो – ‘जो है’ उसे होने दो। अपनी तरफ से सब तनाव छोड़ दो और जीवन को बहने दो – जीवन को घटित होने दो – और जो घटित होगा – मैं विश्वास दिलाता हूँ – वह मुक्त कर देता है।

आदर्श का भ्रम सदियों पाले गये अंधविश्वासों में से एक है। जीवन किसी और के लिए नहीं, कुछ और के लिए नहीं, बस जीने के लिए है। जो किसी लिए जीता है, वह जीता ही नहीं है : जो केवल जीता है वही जीता है।

उस युवक की ओर देखता हूँ। उसके चेहरे पर एक अद्‌भुत शांति फैल गई है। वह कुछ बोलता नहीं है पर सब बोल देता है। कोई एक घंटा मौन और शांत बैठकर वह गया है। वह बदलकर गया है : जाते समय उसने कहा है : “मैं दूसरा व्यक्ति होकर जारहा हूँ।”

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: तुम्हारा पत्र मिला है। नाराज होसकती हो यह जानकर खुशी होती है!


See also
Krantibeej ~ 109 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.