Letter written on 28 Mar 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 28 Mar 1962.

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 95 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 109 (2002 Diamond edition, PS is not printed in the book).

The PS reads: "Along with this, there is a letter for Shanta - so send it to her"

Letters to Anandmayee 984.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

मां,
नयी सुबह। नया सूरज। नई धूप। सोकर उठा हूँ। सब नया नया है। जगत्‌ में कुछ भी पुराना नहीं है।

कई सौ वर्ष पहले यूनान में किसी ने कहा था : “एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है।“

सब नया है, पर मनुष्य पुराना पड़ जाता है। मनुष्य नये में जीता ही नहीं, इसलिए पुराना पड़ जाता है। मनुष्य जीता है स्मृति में, अतीत में, मृत में। यह जीना ही है, जीवन नहीं है। यह अर्ध-मृत्यु है।

कल एक जगह यही कहा हूँ। मनुष्य अपने में मृत है। जीवन योग से मिलता है। योग चिर-नवीन में जगा देता है : योग चिर-वर्तमान में जगा देता है।

मानव-चित्त स्मृति के भार से मुक्त होता है तो “जो है” वह प्रगट होजाता है। स्मृति मृत का संकलन है उससे जीवन को नहीं पाया जासकता है। वह ज्ञात में भटकना है। उससे जो अज्ञात है, उसके द्वार नहीं खुलते हैं।

ज्ञात को जाने दो ताकि अज्ञात प्रगट होसके : मृत को जाने दो ताकि जीवित प्रगट होसके – योग का सार-सूत्र यही है।

२८ मार्च १९६२

रजनीश के प्रणाम


Letters to Anandmayee 985.jpg

(पुनश्च: साथ में एक पत्र शांता के लिए है सो उसे भेज देना।)


See also
Krantibeej ~ 095 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.