Letter written on 4 Nov 1962 pm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 4th November 1962 in the evening. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. And actually, there are three numbers there, one crossed out (142) and replaced by another number which is itself crossed out and finally replaced by a pink number, 146. In yet another variation on the numbers theme, we have the last number not two higher than the first, but four.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 101 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 171).

In PS Osho writes: "Since the evening today Ma, your remembrance prevails. Just I was strolling and just standing quietly at the door - the way you started calling me back, I came inside and sat down for writing the letter. Sometimes what you are doing!"

Letters to Anandmayee 939.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

रात्रि: ४ नवम्बर १९६२

प्रिय मां,
एक मित्र कुछ कागज के फूल भेंट कर गये हैं। उन फूलों को देखता हूँ – जो दीख रहा है उसके पार उनमें कुछ भी नहीं है। उनमें सब कुछ दृश्य है; अदृश्य कुछ भी नहीं और बाहर देहलिया के फूल खिले हैं उनमें जो दीख रहा है उसके पार कुछ अनदीखा भी है और वह अदृश्य ही उनका प्राण है।

आधुनिक सभ्यता कागज के फूलों की सभ्यता है। दीखने – दृश्य पर वह समाप्त है और इसीलिए निष्प्राण भी है। अदृश्य से – अज्ञात से नाता टूट गया है और इसलिए मनुष्य जितना आज जड़ों से अलग हो गया है उतना इसके पूर्व कभी भी नहीं हुआ था।

वृक्ष – फूल-फल-पत्ते सब दृश्य हैं पर जड़ें भूमि में होती हैं – जडें अज्ञात और अदृश्य में होती हैं – और जो जडें देखी जासकती हैं – जड़ें उन पर ही समाप्त नहीं होजाती हैं – और भी जड़ें हैं जो देखी ही नहीं जा सकती हैं। प्राण जहां से महाप्राण से संयुक्त हैं वह केन्द्र अज्ञात ही नहीं अज्ञेय भी है।

इस अज्ञेय से संयुक्त मनुष्य वास्तविक जड़ों को पाजाता है। इस अज्ञेय को विचार से नहीं पाया जासकता है। विचार की सीमा ज्ञेय पर समाप्त है। विचार स्वयं ज्ञेय और दृश्य है और जो दृश्य है वह अदृश्य को जानने का माध्यम नहीं बन सकता है। सत्ता विचार के पार है : अस्तित्व विचार के अतीत है।

अस्तित्व को इसीलिए जाना नहीं जाता है – हुआ जाता है। उससे पृथक – दर्शक होकर परिचित नहीं होना होता, वरन्‌ उसमें एक होकर होना होता है।

विचार छोड़कर – शांत – शून्य होकर यह अद्वैत सध जाता है जो सत्य में – सत्ता में खड़ा कर देता है। कागज के फूल देखने हों तो दूर से देखे जासकते हैं – उनका द्रष्टा हुआ जासकता है – पर असली फूल देखने हों तो फूल ही बन जाना जरुरी है!

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मां, आज संध्या से तुम्हारा स्मरण है। अभी घूम रहा था और तुम द्वार पर मौन खड़ी होकर जो बुलाने लगीं सो भीतर आकर पत्र लिखने बैठ गया हूँ। कभी कभी यह क्या करती हो?


See also
Krantibeej ~ 101 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.