Letter written on 8 Dec 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 8th December 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are two of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner, 154, with the original 152's 2 changed somewhat awkwardly to a 4.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 89 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 181).

The PS reads: "It is possible that I may not be able to come to Chanda in the holidays of December. I am considering to speak at Bombay and Nandurbar. Will inform soon as confirmed. Rest, all OK. How is your health, now?"

Letters to Anandmayee 948.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
गौतम बुद्ध ने चार आर्य-सत्य कहे हैं : दुख, दुख का कारण, दुख-निरोध और दुख निरोध गामी मार्ग। जीवन में दुख है; दुख का कारण है; इस दुख का निरोध होसकता है और दुख निरोध का मार्ग है।

मैं पांचवा आर्य सत्य भी देखता हूँ और यह पांचवां इन चारों के पूर्व है। वह है इसलिये ये चारों हैं : वह न हो तो ये चारों भी नहीं रह सकते हैं।

यह पांचवां या प्रथम आर्य सत्य क्या है?

वह सत्य है : दुख के प्रति मूर्च्छा। दुख है पर हम उसके प्रति मूर्च्छित हैं। इस मूर्च्छा से ही वह हमें दिखता नहीं है। इस मूर्च्छा से ही हम उसमें होते हैं पर वह हमें संतप्त नहीं करता है। इस धुंधली सी बेहोशी में – मद-तन्द्रा में जीवन बीतता है और जो दुख था वह झेल लिया जाता है।

इस मूर्च्छा में, अचेतना में जो है वह आंख में नहीं आता है और जो नहीं है उसके स्वप्न चलते रहते हैं : वर्तमान के प्रति अंधापन होता है और भविष्य में दृष्टि बनी रहती है। भविष्य के सुखद स्वप्नों के नशे में वर्तमान का दुख डूबा रहता है। इस विधि से दुख दीखता नहीं है और उसके पार उठने का प्रश्न भी नहीं उठता है।

एक कैदी को यदि अपने कारागृह की दीवारें और जंजीरें ही न दीखें तो उसमें मुक्ति की आकांक्षा को पैदा होने का प्रश्न ही कहां है?

इससे इस सत्य को कि हम दुख के प्रति मूर्च्छित हैं – ‘जीवन दुख है’ यह सत्य हमारी चेतना में नहीं है – मैं प्रथम आर्य सत्य कहता हूँ। शेष चार बाद में आते हैं। दुख के प्रति मेरे जागते ही उनका दर्शन होता है।

(यह एक बौद्ध भिक्षु से हुई बातचीत का एक अंश है।)

रजनीश के प्रणाम

८.१२.६२


पुनश्च: संभव है कि इस बार दिसम्बर की छुट्टियों में चांदा न आ पाऊँ। बम्बई और नंदुरबार बोलना का सोच रहा हूँ। जैसा निश्चित होगा शीघ्र लिखूँगा। शेष शुभ। आपका स्वास्थ्य अब कैसा है?


See also
Krantibeej ~ 089 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.