Letter written on 9 Aug 1961 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 9th August 1961 in the morning. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, as had been customary for a long time, now more sporadic. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (14) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue mirror-image "38".

Letters to Anandmayee 831.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

प्रभात:
९ अगस्त ‘६१

मां,
अंधियारा है। ज्ल्दी उठ आया हूं। प्रकाश ने अपने तीर अभी नहीं फेंके हैं। वृक्षों पर चहल-पहल शुरू होरही है। ठोड़ी ही देर और है और सुबह द्वार पर खड़ी हो जानेको है।

एक नया दिन फिर जन्म के करीब है।

प्राति क्षण नया है। हर संध्या, हर प्रभात नये हैं। जीवन सतत परिवर्तन है। हर घड़ी नये रहस्य-द्वार खुलते हैं पर हम हैं अंधे और देख नहीं पाते हैं। यह अंधापन है अतीत का, स्मृति का बीते मृत अनुभव का। स्मृतियों कचरा चेतना को घेर लेता और नित-नवीन के दर्शन से हम वंचित्‌ रह जाते हैं।

सत्य को पाना हो, प्रभु को पाना हो, अपने को पाना हो तो स्मृति से मुक्ति आवश्यक है क्योंकि सत्य चिर-नूतन है – चिर-जीवन है, उसे मृत के माध्यम से नहीं पाया जासकता है।

अज्ञात को कोई ज्ञात से कैसे जान सकता है? अज्ञात को होने देने के लिए ज्ञात का मिट जाना आवश्यक है।

ज्ञात के, मृत के हटते ही, वह जो कालातीत है, अमृत है, शाश्वात आनंद है, उसका अवतरण होजाता है।

ज्ञात से मुक्ति ही ध्यान है।

रजनीश
के
प्रणाम

(पुनश्च: पत्र मिल गया है। प्रभु है जगत में, इससे कांटे हो ही कैसे सकते हैं? दीखते हैं, तो हमारी भ्रांति है। हैं तो बस फूल ही फूल।)


See also
Letters to Anandmayee ~ 11 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.