Manuscripts ~ Reports

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Reports of Nation-Wide Programmes of Acharya Shri

year
A: 7 - 22 Apr 1968
B: 5 May - 29 Jul 1968 (it should be 1967)
C: 2 Aug - 20 Sep 1968 (it should be 2 Aug - 5 Oct 1967)
D: 11 Nov 1968 - 18 Jan 1969 (it should be 1966-1967)
E: 4 Feb - 2 Apr 1969 (it should be 1967)

Chronological order of sections is: D-E-B-C-A.

notes
71 sheets in groups A to E. We have designated them as events:
A: 4 sheets - Reports ~ 01
B: 13 sheets plus 10 written on reverse - Reports ~ 02
C: 17 sheets - Reports ~ 03
D: 8 sheets plus 2 written on reverse - Reports ~ 04
E: 9 sheets plus 7 written on reverse - Reports ~ 05
Missing at least Sheet A-5.
Sheets 23-9R and 23-9V have been erroneously in Manuscripts ~ Messages.
Sheet numbers showing "R" and "V" refer to "Recto and Verso".
see also
Osho's Manuscripts
Manuscripts ~ Reports Timeline Extraction


sheet no original photo enhanced photo Hindi transcript
A-1 Man1066.jpg Man1066-2.jpg
समाचार विभाग
धर्म चक्र प्रवर्तन:
आचार्यश्री के देशव्यापी कार्यक्रम
संकलन : जटूभाई मेहता
"शांति में, मौन में, शून्य में खड़े होकर जीवन को देखना ही धर्म है| वही है धर्म की कला| उसी से उसमें मिलन होता है, जो कि सत्य है| प्रेम की भाषा में वह सत्य ही परमात्मा है|"
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बम्बई, क्रासमैदानमें विराट सत्संग:
आचार्य श्री ७ अप्रैल की दोपहर बंबई पधारे| संध्या ही उन्होंने क्रास मैदान में आयोजित सत्संग की प्रथम सभा को संबोधित किया| जैसे ग्रीष्म के उत्ताप के बाद भूमि जल के लिए प्यासी होती है वैसे ही हज़ारों व्यक्ति उनके अमृत शब्दों के लिए आतुर रहते हैं| और जो उनके शब्दों के साथ यात्रा करने में सफल होता है, वह उन्हें सुनते-सुनते ही किसी और ही लोक में प्रविष्ट हो जाता है| उनके श्रोताओं में इसीलिए सैकड़ों व्यक्ति ध्यानस्थ देखे जा सकते हैं| उनकी उपस्थिति मात्र से ही जैसे चित्त शांत और शीतल हो जाता है| उन्होंने अपने इस प्रथम उद्द्बोधन में यहाँ कहा: "विचार परमात्मा का मार्ग नहीं है| विचार सत्य का द्वार नहीं है| सत्य तो है अज्ञान| और विचार केवल उसे ही विचार सकता है जो कि जाना ही हुआ है| वह ज्ञान का अतिक्रमण करने में समर्थ नहीं है| वह ज्ञात में ही गति है| वह स्मृति में ही परिभ्रमण है|और इसीलिए वह नये में और अनजान में और अज्ञान में नहीं ले जाता है| वह तो अतीत में, की बासे में और मृत में ही भटकता रहता है| और सत्य अतीत नहीं है| वह चिर नूतन है| वह तो नित नवीन है| वह तो सदा ही नया और जीवंत है| इसलिए उसे जानने और जीने के लिए विचार से बिल्कुल ही भिन्न दिशा उपलब्ध करनी होती है| वह दिशा है निर्विचार की| विचार को जाने दें और निर्विचार को आने दें| विचार की तरंगों में ही सत्य का शांत सागर छिपा है| शांत होकर, शून्य होकर जीवन को देखें| उसी दर्शन में उससे मिलन होता है जो कि सत्य है| और उस एक को ही प्रेम परमात्मा कहता है|"
 
"जीवन को प्रेम करो----जीवन को उसकी गहराइयों में जिओ----क्योंकि जीवन के मंदिर में ही परमात्मा का आवास है"
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बंबई, सी. जे. हॉल में प्रश्नोत्तरी:
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आचार्यश्री ने ७,८,९,१० अप्रेल संध्या क्रास मैदान की विशाल सभाओं को संबोधित किया और प्रतिदिन सुबह सी. जे. हॉल में जिज्ञासुओ के प्रश्नों के उत्तर दिए | उन्होंने इन चर्चाओं के दौरान कहा:"जीवन से लड़कर मत जियो| शत्रुता की दृष्टि सम्यक नहीं है | मैत्री के प्रकाश में ही जीवन के रहस्य उद्घटित होते हैं | सर्वप्रथम चाहिए की पूर्ण स्वीकृति----जीवन के प्रति सदभाव | लेकिन हज़ारों बरसों की जीवन-विरोधी शिक्षाओं नें मनुष्य में यह भाव ही छीन लिया है | ओर इस भाव के अभाव में हम जीवन को जानने से वंचित रह जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं है | जीवन तो समय है----प्रतिपल हम इसमें हैं | हम वही हैं | जैसे मछली सागर में है ऐसे हम जीवन में हैं | लेकिन मछली यदि सागर-विरोधी हो जावे तो उसकी जो गति हो वही हमारी गति हो गयी है | इसलिए में कहता हूँ: जीवन को प्रेम करो, क्योंकि जीवन की गहराइयों में ही परमात्मा का आवास है|"
 
"धर्म तो एक है | धर्म तो स्वरूप है | लेकिन हमने तो चाँद को दिखानेवाली उंगलियाँ ही पकड़ रखी हैं और उन्हें ही चाँद समझ रहे हैं | इसमें धर्म तो विलीन हो गया है और धर्मों की भीड़ लग गयी है |"
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महावीर जयंती पर पूना में प्रवचन:
आचार्यश्री ११ अप्रेल को पूना पधारे | सुबह ही उन्होंने हिंदविजय थियेटर में आयोजित महावीर जयंती की सभा को संबोधित किया| उन्होंने कहा:"महावीर अर्थात सत्य, महावीर अर्थात अहिंसा| लेकिन हम तो व्यक्तियों को पकड़ लेते हैं, और सत्यों को भूल जाते हैं | चाहिए यह कि सत्य को पकड़ें और व्यक्तियों को छोड़ दें | एक ही सार है | और वह सत्य प्रत्येक में है | व्यक्ति तो इशारे है | महावीर, बुद्ध, कृष्ण या क्राइस्ट तो इशारे हैं | लेकिन हम इशारों को पकड़ कर बैठ गये हैं, और इशारों की ही पूजा कर रहे हैं | मनुष्य की यह विक्षिप्तता अद्भुत है, और इस विक्षिप्तता को ही धर्म मानकर समझा गया है | जैसे कोई राह के किनारे लगे संकेतों को ही मंज़िल समझ ले, एसी ही यह दशा है | सत्य तो एक है लेकिन इशारे तो अनंत हो सकते हैं | और इन इशारों को पकड़ने के कारण ही हिंदू, जैन, मुसलमान और ईसाई ऐसे संप्रदाय पैदा हो गये हैं | जो इन इशारों से उपर उठता है, और उसकी खोज करता है जिसकी ओर कि इशारा इंगित करता था, वह स्वयं पर और सत्य पर पहुँच जाता है | सत्य का वह अनुभव ही धर्म है | वह धर्म एक ही है, क्योंकि
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धर्म का अर्थ है स्वभाव ---स्वरूप | वह तो एक ही हो सकता है | वहाँ तो पहुँचकर स्वयं का व्यक्तित्व भी छूट जाता है | वहाँ तो बस वही रह जाता है, जो है |"
"धर्म एक मंदिर है और अधर्म के देवता | इसलिए प्रभु के चरणों में चढ़ाए गये फूल शैतान को ही चढ़ते रहे हैं | क्या समय नहीं आ गया है कि हम वहमों को उखाड़े और देखें की पुरोहित की आड़ में कौन खड़ा है?"
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पूना में जनसभा:
आचार्यश्री ने ११ अप्रेल की रात्रि एक विशाल जनसभा को संबोधित किया | उनकी क्रांतिकारी वाणी अनेक हृदयों को आंदोलित कर देती है | वे तो एक क्रांति की भाँति हैं | उनसे सुनकर सिर्फ़ स्वर्ग ही शेष बचता है सभी कूडा करकट जलकर राख हो जाता है | उन्होंने यहाँ कहा: "धर्म की आड़ में अधर्म जी रहा है | पुरोहित की आड़ में परमात्मा नहीं, शैतान है | धर्म का मंदिर है, लेकिन आवास उसमें अधर्म का है | शैतान की यह तरकीब बहुत कारगर सिद्द हुई है | क्योंकि अधर्म स्पष्ट हो तो उसमें लड़ना अत्यंत आसान है | लेकिन लेकिन वहाँ वह स्वयं तो शुभ वस्त्रों में आता है, तब बड़ी कठिनाई होती है | क्योंकि तब उसे पहचानना ही कठिन हो जाता है | सदियों से मनुष्यता इसी कठिनाई से गुजर रही है | इसीलिए तो यह विरोधाभासी घटना घटती रही है कि धर्मों की बाढ़ आती गई है और साथ ही अनुपात में अधर्म भी बढ़ता गया है | लेकिन अब जागने का समय आ गया है और धर्म के वस्त्रों को उघाड़कर देखने की ज़रूरत है कि उनके अंदर अधर्म तो नहीं बैठा हुआ है?"
 
"धर्म का रहस्य पूछना है तो पूछो बीज से----पूछो बूँद से| बीज मिटता है तो वृक्ष हो जाता है और मनुष्य भी क्या एक बीज नहीं है? बूँद मिटती है तो सागर हो जाती है | फिर मनुष्य भी क्या एक बूँद नहीं है?"
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सिंधी समाज जबलपुर में प्रवचन:
आचार्यश्री ने १४ अप्रेल की रात्रि सिंधी समाज द्वारा आयोजित एक सभा को उद्बोधित किया | उन्होंने यहाँ कहा:"मैं तो एक ही मार्ग मानता हूँ, जीवन को पाने का | मैं तो एक ही द्वार जानता हूँ प्रभु के मंदिर का | और आप पूछते हैं कि वह मार्ग क्या है?----वह द्वार क्या है? वह मार्ग है स्वयं को मिटा देने का | वह द्वार है शून्य हो जाने का | और मेरी बात का भरोसा ना हो तो पूछो बीज से---पूछो बूँद से | मैंने उन्हीं से पूछा है और जाना है | बीज वृक्ष हो जाता है | बूँद सागर हो जाती है|
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क्या आप परमात्मा होना चाहते हैं? तो मार्ग वही है---द्वार वही है जो कि बीज का है, जो कि बूँद का है | मिटो ताकि पा सको | खो दो ताकि खोज सको | आह! कितनी सुगम है बात लेकिन अहंकार को खोने का तो हमें स्मरण ही नहीं आता है |"
 
"जीवन परम सूंदर है | लेकिन उसके लिए ही जिनके की अंतस .सौंदर्य से भरे हैं | जीवन तो दर्पण है और उसमें हम वही देख पाते हैं जो की हम हैं |"
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जबलपुर में कला प्रदशनी का उदघाटन :
आचार्यश्री ने १७ अप्रेल की रात्रि कला निकेतन में आयोजित वार्षिक कला प्रदर्शनी का उदघाटन किया | एक बड़ी संख्या में कला प्रेमी उन्हें सुनने को एकत्रित हुए | जीवन का कोई भी पहलू क्यों ना हो, उनकी मौलिक दृष्टि सदा ही नये आयामों का अनावरण करती है | उन्होंने यहाँ कहा : "जीवन सौंदर्य है | लेकिन केवल उन्हीं के लिए जिनके कि अंतस भी सुंदर हैं | क्योंकि जीवन तो वस्तुतः एक दर्पण है, और उसमें हमें वही दिखाई पड़ता है जो की हममें हैं | वह हमारा ही ...है | इसलिए कला का मूल आधार सुंदर अंतस के सृजन में है | वह विषय-वस्तु का उतना सृजन नहीं है जितना की अंतस का | यदि जब कला विषयगत ही रह जाती है, तब वह ज़्यादा नहीं होती है | कला की, कला की भाँति पूर्ण प्रतिष्ठा तो तभी होती है जब वह आत्मगत होती है | वह कर्म की सूक्ष्मतम क्रिया है | वह सत्य-साक्षात्कार की सूक्ष्मतम कीमीया है | लेकिन मात्र विषयगत होकर वह एंटिक ही होकर रह जाती है |विषयगत दृष्‍टि की न कोई गहराई है, न कोई उँचाई | वह तो जीवन की सतह पर जीना है | कला इतनी सतही होकर आत्मघात कर लेती है | क्योंकि जहाँ गहराई नहीं, उँचाई नहीं, वहाँ कला की संभावना ही कहाँ है ? आज कला के जगत में एसा ही आत्मघात चल रहा है | मैं आपको ---आप नवोदित कलाकारों को इससे सावधान करना चाहता हूँ | जीवन की गहराइयों में --- अंतस में चाहिए सौंदर्य का सृजन | आत्मा होनी चाहिए सुंदर | फिर उस सुंदरता का अनुभव ही परमात्मा का साक्षात्कार बन सकता है |"
"कर्म को जानना है ---तो भूलकर भी शस्त्रों में मत खोजना | धर्म मृत शब्दों में कहाँ? वह तो सदा ही जीवंत प्रेम में है |"
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लाला लाजपत राय भवन, दिल्ली, में प्रवचन :
आचार्यश्री, २२ अप्रेल को दिल्ली पधारे | सर्वेंट्स ऑफ पीपल सोसाइटी की ओर से लाला लाजपत राय भवन में आयोजित सभा को उन्होंने संबोधित किया |
- - (Missing at least sheet numbered 5 by Osho)
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समाचार विभाग
धर्म चक्र प्रवर्तन :
आचार्यश्री. के देशव्यापी कार्यक्रम
संकलन : जटू भाई मेहता
"शब्द और शास्त्र से सीखे गये ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है | क्योंकि, वह ज्ञान ही नहीं है |"
इंदौर में सत्संग का विराट आयोजन :
आचार्यश्री. 5, 6, 7, 8 मई के लिए इंदौर पधारे | राजबाडे के प्रांगण में प्रतिदिन हज़ारों लोगों ने उनकी अमृतवाणी को सुना | इंदौर के लिए उनके सान्निध्य के वे क्षण अविस्मरणीय हो गये हैं | आचार्यश्री ने यहाँ कहा : " ज्ञान केवल वही है जो अनुभव से उपलब्ध होता है | उधार और बासे, शब्द और शास्त्र से सीखे गये ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है | क्योंकि, वह ज्ञान ही नहीं है | एसा ज्ञान, अज्ञान को तो मिटाता ही नहीं और उल्टे अहंकार बन जाता है | जबकि वास्तविक ज्ञान के मार्ग पर अहंकार से बड़ी और कोई बाधा नहीं है | अहंकार अज्ञान की रक्षा है | वह अज्ञान का रक्षाकवच है | इसलिए, जो ज्ञान का अभिप्सु है, उसे अहंकार खोने को तैयार होना पड़ता है | अहंकार के मुल्य पर ही आत्मा मिलती है | और आत्मा ही ज्ञान है | और आत्मा ही मुक्ति है | और आत्मा ही परमात्मा है | "


"महात्वाकांक्षा है युद्धों की जननी | वह ज्वर आनेवाली पीढ़ियों को न दें | इतना ही हम कर सकें तो इससे बड़ी मनुष्यता की दूसरी सेवा नहीं है |"
लायंस क्लब इंदौर में,
आचार्यश्री. ने 7 मई की संध्या लायंस क्लब इंदौर के सदस्यों को उद्द्बोधित किया | उनहोंने यहाँ कहा: " मनुष्यता युद्धों से पीड़ित है | हम सदा लड़ते ही रहे हैं और लड़ने के कारण जीने का अवसर ही नहीं मिल पाता है | जीवन के अनुभव और आनंद के लिए शांति चाहिए | शांति के अभाव में जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, शुभ है, सुंदर है, सरल है, वह सब अपरिचित ही रह जाता है | इसलिए ही हमारा जीवन इतनी व्यर्थता, उब और उदासी से भर गया है | लेकिन शांति कैसे संभव है ? महत्वाकांक्षी चित्त शांत नहीं हो सकता है | महत्वाकांक्षा ही मूलतः समस्त हिंसा का आधार है | वह ही युद्धों की जननी है | और हम आनेवाली पीढ़ियों को भी महत्वाकांक्षा के ज्वर में ही पीड़ित किए जा रहे हैं | महत्वाकांक्षा का ज्वर नहीं, सिखाना है आत्मानंद | महत्वाकांक्षा दूसरे के सुख से ईर्ष्या है | वह दूसरे को पार करने की होड़ है | आत्मानंद का दूसरे से कोई संबंध नहीं | वह स्वयं के आनंद


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की सतत खोज है | वह निरंतर स्वयं का ही अतिक्रमण है | एसे व्यक्ति ही उस समाज का निर्माण करते सकते हैं जहाँ कि हिंसा न हों, युद्ध न हों और मनुष्य की शक्तियाँ आत्म विनाश में नहीं आत्मसृजन में लग सकें | इस दिशा में कार्य करने में जो संलग्न उसे ही मैं मनुष्यता का सेवक कहता हूँ | "
 
" धर्म की हत्या की है विश्वास ने | इसलिए यदि धर्म को पुनर्जन्म देना है तो विचार को जगाना आवश्यक है | "
गीता ज्ञान मंदिर इंदौर में,
आचार्यश्री. 8 मई की सुबह गीताज्ञान मंदिर पधारे | वहाँ एक वृहत सभा को उन्होंने संबोधित किया और कहा : " विचार को जगाओ ताकि विश्वास के अन्धेपन की मृत्यु हो सके | विश्वास के अन्धेपन ने ही धर्म की हत्या कर दी है | मनुष्य को इस अन्धेपन से छुड़ाना है और उसे पुनः आँखें देनी हैं | यह कौन करेगा ? आह ! यह प्रत्येक को ही अपने लिए करना पड़ेगा | क्योंकि कोई दूसरा किसी को वे आँखें नहीं दे सकता जो एक सत्य के या प्रभु के दर्शन में समर्थ बनती हैं | "
 
" मैं तथाकथित ज्ञान से मुक्ति की प्रार्थना करने आया हूँ | क्योंकि वही अज्ञान की शरणस्थली है | "
दमोह में सत्संग ,
आचारयाश्री. के सान्निध्य में 13, 14, 15 मई को यहाँ सत्संग आयोजित हुआ | इस अवसर पर दमोह की प्रबुद्ध जनता ने अपूर्व आनंद अनुभव किया | एक क्रांति की लहर ही जैसे फैल गई | आचार्याश्री ने यहाँ कहा : " मैं ज्ञान से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने आया हूँ | क्योंकि, वह ज्ञान जो हम दूसरों से सीख लेते हैं, उस ज्ञान के जन्म में अवरोध बन जाता है, जो कि कभी सीखा नहीं जाता है वरन स्वयं में ही आविर्भूत होता है | आत्मज्ञान के लिए सीखे हुये ज्ञान के बोध से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है | क्योंकि वही अज्ञान की शरणस्थली है | अज्ञान सीखे हुये ज्ञान में ही छिपकर स्वयं को बाधक होता है | इसलिए मिथ्याज्ञान अज्ञान से भी ज़्यादा आत्मघाती है | एसे ज्ञान को कचरे की भाँति स्वयं से बाहर फेंक दें | उससे निर्भार हो जावें तो हम फिर उन पर्वतों की यात्रा की जा सकती है जहाँ कि ज्ञान का सूर्य जीवन के शिखरों पर स्वर्ण आलोक की वर्षा कर रहा है | "
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7. विश्वयुद्ध के बद
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" मैं कौन हूँ ? इसे ही जो नहीं जानता है, उसके जीवन में मंगल फलित नहीं हो सकता है | "
रोटरी क्लब दमोह में -------
आचार्यश्री. ने 14 मई की संध्या रोटरी क्लब दहोह को संबोधित किया | उन्होंने यहाँ कहा : " मैं कौन हूँ ? यह भी हमें ज्ञात नहीं है | और एसे अज्ञान में फिर मनुष्य जो भी करता है क्या वह शुभ हो सकता है ? अज्ञान से मंगल फलित नहीं हो सकता है | इसलिए, जीवन को मंगलमयी बनाने के लिए आत्मज्ञान पहला सोपान है | उसके अभाव में सब व्यर्थ है | वह ज्ञान ही जीवन को आलोकित करने में समर्थ है | अन्यथा अंधकार में छूट जाने और कोई उपाय नहीं है | इसलिए , जानो | स्वयं को जानो | स्वयं को जानने का मूल सूत्र क्या है ? वह है : " स्वयं के प्रति जागना | " सोये हुये मत जियो | मूर्छित मत जियो | स्वयं के प्रति सचेत और जागरूक जो जीता है, क्रमशः उसे दर्शन प्रारंभ हो जाते हैं जो कि वह है | "
 
" सत्य पाना है तो दौड़ो नहीं, रूको | क्योंकि, जो स्वयं में ही है, उसे दौड़कर नहीं पाया जा सकता है | "
जैन मंदिर दमोह में -------
आचार्यश्री. ने 15 मई की सुबह स्थानीय जैन मंदिर में आयोजित एक विशाल सभा को अपना संदेश दिया | उन्होंने यहाँ कहा : " सत्य तो अत्यंत निकट है, लेकिन हम उसे नहीं पाते हैं क्योंकि हम उसे दूर खोजते हैं | सत्य तो स्वयं में है, लेकिन खोजनेवाले उसे खो देते है क्योंकि उसे तो तभी पाया जा सकता है, तब जब सब खोज छोड़कर चित्त शांत होता है और स्वयं में झाँकता है | सत्य पाना है तो खोजो नहीं, ठहरो | दौड़ो नहीं, रूको | और तब पाया जाता है कि वह तो सदा से उपलब्ध ही है | "
 
" जीवन चित्र नहीं है | और जो चित्र में ही उसे खोजते है, वे जीवन को जान ही नहीं पाते हैं | "
बंबई में विराट सत्संग :
आचार्याश्री. 20, 21, 22, 23 मई के लिए बंबई आये | उनके सान्निध्य में एक विराट सत्संग क्रास मैदान में आयोजित हुआ | हज़ारों पीपासुओं ने उनकी कान्तिमयी वाणी सुनी और लाभान्वित हुए | वे तो अपने साथ सदा क्रांति का एक उद्घोष लिए ही चलते हैं | उन्होंने यहाँ कहा : " जीवन निद्रा नहीं है | लेकिन, हम उसे सोए सोए ही खो देते हैं | इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य तो सभी को मिलता है लेकिन जीवन नहीं | जीवन तो केवल वे ही उपलब्ध
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7. विश्वयुद्ध के बादल आकाश में हैं,
और वे रोज घने से घने होते जाते हैं,
मनुष्यता किसी बड़ी दुर्घटना के करीब है,
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कर पाते हैं जो कि जागने में समर्थ हो जाते हैं | यह जागने की विधि ही धर्म है | इसलिए, धर्म नया जीवन देता है | क्योंकि, जागते ही व्यक्ति पाता है कि वह तो अमृत है, वह तो आत्मा है, वह तो स्वयं अनंत जीवन है | इसलिए मित्रों, नींद छोड़ो और उसे देखो जो कि भीतर है | उसका दर्शन जन्म जन्मों की प्यास मिटा देता है | और उसके दर्शन से ही उस परम तृप्ति का अनावरण होता है, जिसे कि मैं परमात्मा कहता हूँ | "
 
" परमात्मा की संपदा प्रत्येक की प्रतीक्षा कर रही है | लेकिन, हम कंकड़ पत्थर बीनने में ही समय गवाँ देते हैं | "
जीवन जाग्रति संगोष्ठी, जबलपुर,
आचार्यश्री. के सान्निध्य में 30 मई को जीवन जागृति केंद्र, जबलपुर द्वारा संगोष्ठी आयोजित हुई | उसमें आचार्यश्री ने कहा : " जीवन पथ पर बहुत हीरे-मोती बिखरे हैं, लेकिन हम कंकर-पत्थर बीनने में ही समय गवाँ देते हैं तो दोष किसका है ? इसलिए, एक-एक पल होश से जीना ज़रूरी है | एक एक कर्म होश से करना ज़रूरी है | क्योंकि होशपुर्वक चलने से वह सब संपत्ति हमारी हो जाती है जो कि जीवन हमें भेंट करना चाहता है | स्वभावतः सोए हुए लोगों को कोई भेंट नहीं दिखाई देती है ! और हम सोये हुए हैं इसलिए की एक मानसिक दारिद्र्य हमें निरंतर घेरे रहता है | मैं कहता हूँ : जागो और समृद्ध हो जाओ | परमात्मा की संपदा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है | "
 
" शब्द सत्य नहीं है | इसलिए जो शब्दों में खोजता है, वह सत्य से वंचित रह जाता है | "
माटुंगा, बंबई में सत्संग ;
आचार्यश्री. 2 और 3 जून के लिए माटुंगा, बंबई, पधारे | उन्होंने यहाँ विशाल जनसमूह को संबोधित किया | उन्होंने कहा : " शब्द सत्य नहीं हैं | और इसलिए जो शब्दों में खोजता है वह सत्य से वंचित रह जाता है | खोजना ही है तो शब्दों में नहीं, निःशब्द में खोजो | शस्त्रों में नहीं, शून्य में खोजो | क्योंकि, शून्या में ही स्वयं का साक्षात होता है | और जो स्वयं को जान लेता है, उसका जीवन सत्य हो जाता है | स्वयं से अपरिचित जीवन ही असत्य जीवन है | "
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विश्वयुद्ध के बादल आकाश में हैं,
और वे रोज घने से घने होते जाते हैं,
मनुष्यता किसी बड़ी दुर्घटना के करीब है,
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" कैसा आश्चर्य है कि सम्राट है स्वयं में | और हम भिखारी बने दूसरों के द्वार पर खड़े हैं ! "
उदयपुर में साधना शिविर :
आचार्यश्री के सानिध्य में 5, 6, 7 जून को यहाँ एक साधना शिविर आयोजित हुआ | उदयपुर की जनता का सदभाग्य है कि आचर्यश्री प्रतिवर्ष एक साधना शिविर के लिए यहाँ पधारते हैं | उनके शब्द क्रांति भी लाते हैं और शांति भी | उनके शब्द मिटाते भी हैं और बनाते भी | उनके शब्दों में अदभुत जादू है | निश्चय ही वह उनके अद्भुत व्यक्तित्व की ही अनुगूंज है | उन्होंने यहाँ शिविरार्थियों को संबोधित भी किया और ध्यानयोग में भी उनका प्रवेश कराया | उन्होंने यहाँ कहा : " मैं कहता हूँ कि शांति का परम राज्य प्रत्येक मनुष्य के भीतर है | लेकिन, शायद जो अत्यंत निकट है उसे हम इस कारण ही भूल जाते हैं | और जो दूर है, उसे दूर के कारण ही पाने की आकांक्षा से भर जाते हैं | लेकिन, मित्रों, जो निकट को ही नहीं पा सका है क्या वह दूर को पा सकता है ? उसकी दौड़ पागलपन के अतिरिक्त और क्या है ? इसलिए, स्वस्थ चित्त व्यक्ति पहले स्वयं को ही पाना चाहे तो इसमें आश्चर्य नहीं है | और आश्चर्य तो यह है कि जो स्वयं को पा लेता है, फिर उसकी और कुछ भी पाने की दौड़ नहीं रह जाती है | क्योंकि, स्वयं में तो उस सम्राट का ही वास है, जिसकी कि हम भिखारियों को कोई खबर ही नहीं है | "
 
" प्रेम और प्रेम और प्रेम | क्योंकि, प्रेम प्रभु का द्वार है | "
चान्दा में प्रवचन :
आचार्यश्री. 13, 14 जून चान्दा पधारे | उन्होंने श्री. रेकचन्द जी पारख एवं सौ. मदन कुँवर् पारख की सुपुत्री ची. सुशीला के विवाहोत्सव पर आशीर्वाद देते हुए कहा : " प्रेम प्रभु का द्वार है | और इसलिए प्रेम में जो जितना गहरा उतरता है वह परमात्मा के उतना ही निकट पहुँच जाता है | और वही प्रेम की कसौटी और परीक्षा भी है | प्रेम प्रभु में न ले जाये तो जानना कि वह प्रेम नहीं है | प्रेम पशु में नहीं ले जाता है, और जो ले जाता है, वह प्रेम नहीं है | वैसा प्रेम प्रेम का आभास ही है | और हममें से अधिक
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10:
बस स्वयं को पाना होता है,
सत्य उधार नहीं मिल सकता है, वह तो स्वयं का साकार
हुआ श्रम ही है.
और, एसे सत्य की खोज की तैयारी ही धर्म की शिक्षा
है
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उस आभास मे ही जीते और समाप्त हो जाते हैं | इसलिए ही तो जीवन में इतनी कुरूपता है, इतना दुख है, इतनी अशांति है | या प्रेम होता तो यह सब हो सकता था ? नहीं, प्रेम नहीं है | जीवन के घाव बहुत प्रमाण में कह रहे हैं कि प्रेम नहीं है | इसलिए मैं क्या शुभकामना करूँ ? यही कामना करता हूँ कि तुम्हारा जीवन प्रेम बने | उससे बड़ी और कोई उपलब्धि नहीं है | क्योंकि, अंततः वही व्यक्ति की सरिता को परमात्मा के सागर में पहुँचानेवाला पथ सिद्ध होता है | "
 
" धर्मों में धर्म नहीं है | क्योंकि, धर्म तो एक है और एक ही हो सकता है | "
चान्दा में विचारगोष्ठी :
आचार्यश्री. के सान्निध्य में 14 जून की सुबह एक विचारगोष्ठी यहाँ हुई | उसमें उन्होंने कहा : " धर्मों में धर्म नहीं है | धर्म तो है एक | और इसलिए वह धर्मों में कैसे हो सकता है ? फिर धर्म का संगठनों और संप्रदायों से भी क्या वास्ता ? क्योंकि, धर्म तो संगठन नहीं, साधना है | वह तो अत्यंत वैयक्तिक और निजी अनुभूति है | उसका भीड़ और समूह से क्या संबंद ? उल्टे भीड़ और समूह की संरचना के कारण वह धर्म निरंतर खोता ही चला गया है जो की व्यक्ति को स्वयं की निजता में ही केवल उपलब्ध हो सकता है | फिर ये संगठन और संप्रदाय मनुष्य को मनुष्य में तोड़ते और लड़ाने के मध्यम भी बन गये है | जो कि स्वाभाविक ही है क्योंकि बिना घृणा के संगठन खड़े ही कैसे हो सकते हैं ? और मैं पूछता हूँ कि जो मनुष्य को ही मनुष्य से तोड़ रहे हैं, वे मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ सकते हैं ? "
 
" धर्म है आंतरिक ज्योति | वह बाह्य आयोजन और अनुष्ठान नहीं है | ईयालिए जो उसे बाहर खोजता है, वह उसे खो देता है | "
गोंदिया में संगोष्ठी :
आचार्यश्री. 15 जून को गोंदिया पधारे | रात्रि में उनके सान्निध्य में एक गोष्ठी हुई जिसमें उन्होंने कहा : " धर्म है मनुष्य की आंतरिक यात्रा | वह स्वयं में गति है | धर्म न तीर्थों में है, न मंदिरों में | वह बाह्य आयोजन और अनुष्ठान नहीं है | और इसलिए जो उसे बाहर खोजता है, वह उसे खो देता है | और चूँकि सैकड़ों वर्षों से हमने उसे बाहर ही खोजा है, इसलिए खो दिया है | मनुष्य का पथ बाह्य के अतिभार में ही इतना अंधकारग्रस्त है | और यदि हम अंतस की ज्योति को पुनरुज्जिवित नही कर सके तो मनुष्यता का कोई भी भविष्य नहीं
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है | इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य को अंधकार और आत्मघात से बचाना है तो उसे उस आंतरिक प्रकाश से पुनर्मन्डित करना आवश्यक है जो कि उसके ही भीतर है जो क़ी उसका स्वरूप है, जो कि उसका धर्म है | "
" विचार है विद्रोह | और विद्रोह ही है वह अग्नि जिसमें चित्त का स्वर्ण निखरता है | "
जीवन जाग्रति केंद्र संगोष्ठी, जबलपुर
आचार्यश्री. के सत्संग के लिए 25 जून को जीवन जाग्रति केंद्र जबलपुर ने एक संगोष्ठी आयोजित की | उसमें आचार्यश्री ने कहा : " सत्य की खोज में साहस से बड़ा और कोई गुण नहीं है | साहस ही यौवन है | और केवल वे चित्त ही सत्य के शिखरों को छू सकते है जो कि साहस के कारण सदा युवा है | साहस जहाँ नहीं है, वहाँ चित्त बूढ़ा है | बूढ़ा चित्त विश्वास कर सकता है लेकिन विचार नहीं है | क्योंकि, विचार तो विद्रोह है | और क्या आपको ज्ञात नहीं है कि सतत विद्रोह की अग्नि से गुज़रे बिना चित्त का स्वर्ण कभी भी निखरा नहीं है ? "
 
" सत्य के सूर्य के लिए चाहिए स्वतंत्रता की आँखें | परतंत्र आत्मा के लिए परमात्मा नहीं है | "
सूरत में सत्संग :
आचार्यश्री. 28, 29, 30 जून को सूरत पधारे | सूरत में यह उनका पहला ही पदार्पण था | लेकिन उनके क्रांतिकारी वचनों ने एक अभूतपूर्व वातावरण का यहाँ सृजन किया | सूरत के बौद्धिक वातावरण में एक नया जीवन ही आ गया था | उन्होंने यहाँ कहा : " परमात्मा परम स्वतंत्रता है और इसलिए केवल वे व्यक्ति ही उसकी अनुभूति को उपलब्ध हो सकते हैं, जो कि स्वयं को समस्त मानसिक दासताओं से मुक्त कर लेते हैं | और मान की सारी गुलामी हमारी स्वयं की निर्मित है | वह है क्योंकि हमारा उसे सहयोग है | हमारे सहयोग के बिना शारीरिक बंधन तो हो सकते हैं लेकिन मानसिक नहीं | इसलिए मानसिक दासता का सारा दायित्व स्वयं व्यक्ति पर ही है | हम परतंत्र हैं क्योंकि हमने स्वतंत्र नहीं होना चाहा है | स्वतंत्रता की कामना ही स्वतंत्रता बन जाती है | क्योंकि, जो स्वतंत्र होना चाहता है, वह परतंत्रता को अपना सहयोग देना बंद कर देता है | और स्वतंत्र होते ही आँखें
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ज्ञान केवल वह है जो कि स्वानुभव भी है |
शब्द और शस्त्र से सीखे गये ज्ञान का कोई भी मूल्य नहीं है, क्योंकि वह ज्ञान ही नहीं है |
शास्त्र स्मृति बन जाते हैं |
और स्मृति ही ज्ञान नहीं है |
स्वयं के साक्षात से जो ज्ञान जन्मता है, वह अनिवार्यतः जीवन को बदल जाता है |
यही उसके स्वयं से जन्मे होने की कसौटी भी है |
और जो ज्ञान उधार है, वह मात्र स्मृति को भर देता है लेकिन जीवन उससे अछूता ही रह जाता है | एसा ज्ञान अज्ञान को तो मिटाता ही नहीं ही, उल्टे वह अहंकार भी बन जाता ही |
और अज्ञान पर अहंकार वैसे ही है जैसे नीमचढ़ा करेला | वह रोग पर और महारोग है |
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उस सूर्य की और उठती हैं जो कि सत्य है | सत्य के सूर्य को केवल स्वतंत्र आँखें ही देख सकती हैं | "
 
" आँखें खोलो | बंद आँखों के अतिरिक्त अंधकार और कहीं नहीं है | "
थ्योसोफिकल सोसाइटी सूरत में :
आचार्यश्री ने 28 जून की संध्या थ्योसोफिकल सोसाइटी को संबोधित किया | सोसाइटी का हाल श्रोताओं से खचाखच भरा था | आचार्यश्री ने यहाँ कहा : " मित्रों, क्या तुम आलोक के दर्शन करना चाहते हो ? तो आँखें खोलो ------- आँखें बंद किए हुए तो प्रकाश के सागर के मध्य में खड़े होकर भी तुम्हें प्रकाश के दर्शन न हो सकेंगे | प्रकाश तो सदा है | लेकिन, हम आँखें बंद किए खड़े हैं इसलिए अंधकार में हैं | "
 
" ज्ञान क्रांति है | और वह क्रांति ही धर्म में प्रतिष्ठा है | "
लायंस क्लब सूरत में :
आचार्यश्री 29 जून की संध्या लायंस क्लब में पधारे | उन्होंने यहाँ नीति और धर्म पर अपने क्रांतिकारी विचार प्रकट किए | उन्होंने कहा : " धर्म तो नीति है | लेकिन, नीति धर्म नहीं है | क्योंकि धर्म व्यक्ति के अंतस का आमूल परिवर्तन है | और जब अंतस बदलता है तो आचरण तो बदल ही जाता है | लेकिन इसके विपरीत सत्य नहीं है | आचरण का बदल जाना ही अंतस का बदल जाना नहीं है | आचरण की बदलाहट असीमित हो होती है | वह अंतस के वस्त्र पर खड़ी होती है | और जहाँ दमन है, वहाँ चित्त अस्वस्थ है | मैं दमन के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि मनुष्य की सारी विक्षिप्तता और रुग्णता उसी का फल है | मैं तो चित्त का आमूल परिवर्तन चाहता हूँ | यह परिवर्तन होता है स्व-चित्त के ज्ञान से | और स्व-चित्त का ज्ञान आता है चित्त की प्रक्रियाओं के सम्यक निरीक्षण से | स्वयं के चित्त का निरीक्षण करें | उसे देखें | उसे समझें | और वह समझ ही एक परिवर्तन बन जाती है | ज्ञान क्रांति है | और वैसी क्रांति ही धर्म में प्रतिष्ठा है | "
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" चित्त को बनाना है एक शांत झील ताकि जीवन अपने पूरे सौंदर्य और आनंद के साथ उसमें प्रतिफलित हो सके | और आत्मजागरण से चित्त वैसी झील बन जाता है | "
रोटरी क्लब सूरत में :
आचार्यश्री. ने 30 जून की संध्या रोटरी क्लब के मध्य अपने विचार प्रकट किए | उन्होंने कहा : " जीवन के आनंद को हम नही जान पाते हैं | जीवन की विक्षिप्त दौड़ के कारण | जीवन को ही एसे हम खो देते हैं | जीवन को जानने और जीने के लिए चाहिए, एक सहन्ती, एक मौन, एक अविक्षिप्त चित्त | यह कैसे संभव है ? यह संभव है स्वयं की महात्वाकांक्षाओं के प्रति जगाने से | यह संभव है स्वयं के मानसिक तनावों के प्रति होश से भर जाने से | क्योंकि, स्वयं की चेतना में स्वयं की जाग्रति में जो व्यर्थ दिखाई पड़ता है, वह छूट जाता है | उसे छोड़ना नहीं पड़ता है, वह सहज ही छूट जाता है | आत्मजागरण क्रमशः चित्त को शांति और मौन से भर देता है | चित्त एक विश्रा, बन जाता है | और तभी चित्त की उस शांत और शून्य झील में जीवन अपने पूरे आनंद एर सौंदर्य के साथ प्रतिफलित होता है | "
" व्यक्तित्व की खोज ही है वास्तविक शिक्षा | प्रत्येक को स्वयं जैसा होना है | और जो किसी और जैसा होने के अनुकरण में पड़ता है, वह आत्महंता है | उसकी आत्मा फिर उसे कभी भी क्षमा नहीं कर पाती है | "
एस. एन. डी. टी. महिला महाविद्यालय माटुंगा, बंबई में प्रवचन :
आचार्यश्री. 1 जुलाई की दोपहर एस. एन. डी. टी. महिला महाविद्यालय माटुंगामें पधारे | उन्होंने यहाँ कहा : " व्यक्तित्व की खोज ही वास्तविक शिक्षा है | लेकिन, अभी तो हम विश्वविद्यालयों से अपना व्यक्तित्व खोकर ही बाहर निकलते हैं ! प्रत्येक व्यक्ति कुछ होने को पैदा हुआ है | और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अनूठी प्रतिभा है और अद्वितीय जीवन है | उसे किसी और जैसा नहीं होना है | उसे बनना है स्वयं | उसे होना है अपने जैसा ही | और जिस दिन वह एसा हो जाता है, उसी दिन उसके जीवन में धन्यता और कृतार्थता का अनुभव होता है | और जो दूसरों के अनुकरण में स्वयं को खो देता है, वह सदा दुख में जीता है क्योंकि उसके भीतर जो बीज वृक्ष बनने को लालयोत थे, वे सदा के लिए ही कुंठित होकर रह जाते हैं | "
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5.
धार्मिक कहे जाने वाले लोगों का शिक्षा में उत्सुकता
में कुछ और ही स्वार्थ है. उस स्वार्थ की गहरी और पुरानी जड़ें हैं. उन पर
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" प्रभु की प्यास की पूर्णता ही प्रभु की प्राप्ति है | वह तो सदा निकट है, लेकिन हम ही उसके लिए प्यासे नहीं हैं | "
नंदुरबार में सत्संग :
आचार्यश्री. 10, 11, 12 जुलाई के लिए नंदुरबार पधारे | उनके सैकड़ों प्रेमी यहाँ वर्ष भर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे | प्रभु के लिए वे एसी प्यास जगा देते हैं जो कि बुझती ही नहीं है | और वे कहते भी यही हैं कि जब प्यास पूर्ण होती है तो प्रभु मिल जाता है | प्यास की पूर्णता ही उसकी प्राप्ति है | उन्होंने यहाँ इस प्यास के और बीज भी इस बार बोये | उन्होंने यहाँ कहा : " मैं तो तुम्हें अतृप्त और असंतुष्ट करना चाहता हूँ | क्योंकि व्यर्थ से और असार से जो तृप्त हो जाता है, उसका जीवन भी व्यर्थ हो जाता है | व्यर्थ से, असार से, बाह्य से तृप्त नहीं हो जाना है | क्योंकि तभी सार्थक, और आंतरिक की अभिप्सा जाग सकती है | वह अभिप्सा जब जाग जाती है तो फिर परमात्मा दूर नहीं है | वह तो सदा ही निकट है, लेकिन हम ही उसके लिये प्यासे नहीं हैं | उसके लिए हमारी प्यास के अभाव के अतिरिक्त हमारे और उसके बीच और कोई दूरी नहीं है | "
 
" अंधविश्वास नहीं, आत्मविवेक | क्योंकि अंधविश्वास परतंत्रता है और आत्मविवेक स्वतंत्रता है | "
नंदुरबार महाविद्यालय में :
आचार्यश्री. ने 11 जुलाई की दोपहर महाविद्यालय के विद्यार्थियों को संबोधित किया | उन्होंने उनसे कहा : " हज़ारों वर्षों की मानसिक गुलामी के नीचे मनुष्य दबा है | उसे इससे मुक्त करना है | उसकी मुक्ति से एक अभूतपूर्व सृजनात्मक उर्जा का जन्म होगा और पृथ्वी का नक्शा ही बदल जायेगा | पृथ्वी निश्चय ही स्वर्ग बन सकती है | और यदि वह नर्क है तो हमारे अतिरिक्त और कोई इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है } मानसिक गुलामी का आधार क्या है ? अंधविश्वास | और उससे मुक्ति का द्वार क्या है ? आत्म-विवेक | अंधविश्वास छोड़ो और आत्मविवेक जगाओ तो तुम एक नई मनुष्यता के जन्मदाता बन सकते हो | और यदि मनुष्य को बचाना है तो नये मनुष्य को जन्म देना आवश्यक हो गया है | पुराने मनुष्य ने तो जागतिक आत्मघात की पूरी तैयारी कर ली है | "
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" परमात्मा कहाँ है ? मंदिरों में, मस्जिदों में, गिरजों में ? नहीं | नहीं | हज़ार बार नहीं | वह है वहाँ जहाँ कि हम उसे खोजते ही नहीं हैं | "
जलगाँव में जनसभा :
आचार्यश्री. 12 जुलाई की संध्या जलगाँव पधारे | रात्रि में ही उन्होंने एक वृहत जनसभा को संबोधित किया | उन्होंने यहाँ कहा : " परमात्मा कहाँ है ? मंदिरों में, मस्जिदों में, गिरजों में, गुरुद्वारों में ? नहीं | नहीं | हज़ार बार नहीं | परमात्मा तो वहाँ है, जहाँ हम उसे खोजते ही नहीं हैं | वह है स्वयं में | और इसलिए जो उसे वहाँ खोजता है, वह निश्चय ही उसे पा लेता है | "
" जीवन की कृतार्थता कहाँ है ? बाह्य की दौड़ में ? नहीं | वह तो आंतरिक की उपलब्धि के अतिरिक्त और कहीं भी नहीं है | "
टीचर्स ट्रेनिंग कालेज जलगाँव में,
आचार्यश्री ने 13 जुलाई की प्रातःकाल टीचर्स ट्रेनिंग कालेज में प्रवचन दिया | उन्होंने शिक्षा के उपर अपने अत्यंत मौलिक विचार दिए | उन्होंने कहा : " शिक्षा की दिशा भ्रांत है, इसलिए ही मनुष्य की जीवनदिशा भी खो गई है | मौजूदा शिक्षा पद्धति एकदम अधूरी, अपूर्ण और आंशिक है | उसके कारण एक असंतुलन व्यक्तित्व में निर्मित होता है | वह केवल बौद्धिक है | और इसलिए मनुष्य का समग्र व्यक्तित्व उससे अधूरा ही रह जाता है | बुद्धि के अतिरिक्त और पूरा मनुष्य अशिक्षित ही रहता है | उसका हृदय आशंकित रहता है, उसका अंतःकरण अशिक्षित रहता है, और आत्मा की और तो व्यक्ति की आँखें ही नहीं उठ पाती हैं | और जो शिक्षा आंतरिक की और इशारा नहीं बनती हैं, बस केवल बाह्य पर ही समाप्त हो जाती हैं, वह अशांति तो ला सकती है लेकिन शांति नहीं, वह दौड़ तो जा सकती है लेकिन जीवन को वहाँ नहीं पहुँचा सकती जिसे की उपलब्धि कहा जा सके | जीवन की कृतार्थता तो आंतरिक की उपलब्धि में ही है | वह तो आत्मा को पा लेने के अतिरिक्त और कहीं भी नहीं है | "
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" विज्ञान और धर्म में चाहिए एक समन्वय, एक संतुलन | और मैं पूछता हूँ कि क्या एसा समन्वय असंभव है ? क्योंकि, उस समन्वय पर ही मनुष्य का सारा भविष्य निर्भर है | "
अमलनेर महाविद्यालय में प्रवचन :
आचार्यश्री. 13 जुलाई की दोपहर अमालनेर पधारे | उन्होने अमालनेर महाविद्यालय की हिन्दी समिति का उद्घाटन किया | अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने ' विज्ञान और आध्यात्म ' पर विचार प्रकट करते हुये कहा : " मनुष्यता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि हम विज्ञान और आध्यात्म में अबतक कोई सेतु निर्मित नहीं कर पाय हैं | विज्ञान और अध्यात्म तो वैसे ही हैं जैसे कि शरीर और आत्मा | मनुष्य का व्यक्तित्व उन दोनों का ही अदभुत सम्मेलन है | वह उन दोनों की ही अखंडता है | मनुष्य की संस्कृति भी एसी ही अखंड होनी चाहिए | वह एकांगी होगी तो अपूर्ण होगी | लेकिन अबतक तो जो भी संस्कृतियाँ निर्मित हुई वे सभी अपूर्ण, एकांगी और अतिवादी थीं | पूर्व ने आध्यत्म पर इतना अति आग्रह किया कि विज्ञान को तिलांजलि दे दी और पश्चिम ने ठीक इसके विपरीत किया | पश्चिम ने विज्ञान को विक्षिप्त ही पकड़ा और धर्म को विदा दे दी | फलतः पूर्व हो गया दरिद्र, शक्तिहीन और दास और पश्चिम हो गया अशांत, क्रूर और विक्षिप्त | पूर्व अध्यात्म की अति से पीड़ित है और पश्चिम विज्ञान की | और भविष्य इस पर निर्भर है कि वह इन दोनों अतियों से उपर उठ सकेंगे और एक एसी मानवीय संस्कृति को जन्म दे सकेंगे जिसे कि विज्ञान के कारण शक्तिशाली और समृद्ध हो और आध्यात्म के कारण शांत और आंतरिक आनंद में परिपूरित | एक संतुलन चाहिए , एक समन्वय चाहिए | तो ही उस संस्कृति को जन्म दिया जा सकता है जो कि पूर्ण हो | और मैं पूछता हूँ कि क्या एसा संतुलन और समन्वय असंभव है ? "
 
" मूर्छा ---- स्वयं के प्रति मूर्छा है दुख | क्योंकि, वह उससे परिचित नहीं होने देती है जो कि आनंद है | आत्मा आनंद है | "
अमलनेर में जनसभा :
आचार्यश्री. ने 13 जुलाई की रात्रि मराठी साहित्य संघ द्वारा आयोजित एक वृहत जनसभा को संबोधित करते हुए यहाँ कहा : " वह शक्ति क्या है जो मनुष्य को दुख से बाँधे रखती है ?
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क्या वह मनुष्य के बाहर है ? नहीं | वह शक्ति बाहर नहीं है | वह भी मनुष्य के भीतर है | वह है मनुष्य की स्वयं के प्रति मुर्छा | हम स्वयं के प्रति करीब करीब सोए ही हुए हैं | यह निद्रा ही हमारा दुख है क्योंकि इसके कारण ही हम उस आनंद से परिचित नहीं हो पाते हैं जो कि स्वयं में ही छिपा है | जागना है | स्वयं के प्रति जागना है | और स्वयं के प्रति जागते ही दुख नहीं है, मृत्यु नहीं है, अंधकार नहीं है | "
 
" अहंकार से मुक्त हो जाना ही मोक्ष है | वही है दीवार जो कि स्वयं को स्वयं से ही नहीं मिलने देती है | "
जीवन जागृति केंद्र संगोष्ठी, जबलपुर
आचार्यश्री. के सान्निध्य में 29 जुलाई को जबलपुर में एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी | उन्होंने संगोष्ठी में कहा : " अहंकार के अतिरिक्त आत्मा पर और कौन सा पर्दा है ? वही है दीवार जो की स्वयं से ही मिलने नहीं देती है | उसे तोड़ने में जो समर्थ है वह स्वयं को पाने का अधिकारी बन जाता है | उसे खोने को जो राज़ी है, वह परमात्मा को पा लेता है | उससे मुक्त हो जाना ही मोक्ष है | "
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क्रम -----
1 शिक्षा और धर्म
2 बिंदु बिंदु विचार
3 फूल और फूल और फूल
4 ज्ञान गंगा
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समाचार विभाग
धर्म चक्र प्रवर्तन :
आचार्यश्री के देशव्यापी कार्यक्रम
संकलन : जटू भाई मेहता
" धर्म है आंतरिक | प्रभु का मंदिर है भीतर | और हम उसे बाहर खोजते हैं, इसलिए खो देते हैं | "
ज्ञान मंदिर, ग्वालियर, में सत्संग
ग्वालियर नगर आचार्यश्री. की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था | और जब 2, 3, 4, 5 अगस्त के लिए उनका यहाँ आना हुआ तो जिज्ञासुओ में खुशी की एक
लहर दौड़ गई | 2 अगस्त की दोपहर पंजाबमेल पर उनका भव्य स्वागत किया गया | उसी रात्रि ज्ञान मंदिर लश्कर में उनका त्रिदिवसिय सत्संग प्रारंभ हुआ | सत्संग
में उन्होंने जो कहा वह बंद आँखों को खोलने वाला था | उनके शब्द तो एसे हैं जैसे अंधेरे में बिजली कौंध उठती है | उनके प्रकाश में अंधेरा पक्ष अचानक आलोकित हो उठता है | लेकिन जिनकी नींद गहरी है वे बिजली की कौंध और आवाज़ से भयभीत भी हो उठते हैं | शायद यही भय उनके प्राणों पर छा जाता है कि उनकी नींद ही न टूट . जाए ! आचार्यश्री ने यहाँ कहा : " मैं धर्म के नाम पर मनुष्य को अधर्म में डूबे हुए देखता हूँ | इस तथाकथित अधर्म ने ही धर्म के सत्य को रोका हुआ है | और जबतक हम इस झुठे धर्म से मुक्त नहीं होंगे, तबतक धर्म में हमारी प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है | असत्य के जाने पर ही सत्य का आगमन हो सकता है | मंदिर , मस्ज़िद , और मूर्ति पूजा वाला यह धर्म झुठा है, क्योंकि यह आंतरिक नहीं है | बाह्या से धर्म का क्या संबंध ? धर्म का मंदिर तो मन में है, और धर्म का प्रभु तो भीतर है | और जिसे उसे वहाँ खोजना हो तो उसे बाहर उसकी खोज बंद कर देनी चाहिए | क्योंकि बाहर की खोज के कारण ही भीतर दृष्टि नहीं जा पाती है | "
 
"सत्य है अज्ञात | विचार अज्ञात को नहीं जान सकते हैं | उसे जानने का द्वार तो निर्विचार चेतना है |"
माधवाश्रम, ग्वालियर , में संगोष्ठी
आचार्यश्री. के निकट सान्निद्य के लिए 3और 4 अगस्त की प्रभातवेला में माधव आश्रम में संगोष्ठी का आयोजन किया गया | सूर्योदय के साथ ही यह संगोष्ठी प्रारंभ होनी थी | आचार्यश्री जिज्ञासुओ के उत्तर देते थे | उन्होंने संगोष्ठी में कहा : " विचार से सत्य नहीं जाना जा सकता है | सत्य है अज्ञात और अज्ञात के बारे में सोंच कैसे सकते हैं ? अज्ञात को जानने के लिए तो ज्ञात को छोड़ देना आवश्यक है | जहाँ ज्ञात नहीं है, वहीं अज्ञात का प्रवेश है | विचार ज्ञात हैं | इसलिए
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" विचारों में नहीं, निर्विचार में सत्य उपलब्ध होता है | "
 
" मनुष्य के व्यक्तित्व पर सबसे बड़ी संकट छाया है महत्वकांक्षा की | वही ज्वर है जो कि उसे अशांत और विक्षिप्त किए रहता है | "
महिला महाविद्यालय, मुरार (ग्वालियर), में प्रवचन :
आचार्यश्री. 4 अगस्त की दोपहर महिला महाविद्यालय, मुरार, पधारे | छात्राओं की विशाल सभा को संबोधित करते हुए उन्होने कहा : " मनुष्य का व्यक्तित्व ज्वरग्रस्त है | और यह ज्वर है महत्वकांक्षा का | और दुर्भाग्यों का दुर्भाग्य यह है कि शिक्षा इस ज्वर को घटाती नहीं, विपरीत और बढ़ाती है | शायद ईर्ष्या और द्वेष और प्रतिस्पर्धा के द्वारा अहंकार को त्वरा देने के अतिरिक्त हम मनुष्य के विकास का और कोई मार्ग ही नहीं जानते हैं ? लेकिन मार्ग है और जिसे हम अबतक मार्ग समझते रहे हैं, वह कोई मार्ग ही नहीं है | वह तो एक प्रकार का सान्निपात है, जिसमें दौड़ना तो हो जाता है लेकिन पहुँचना कहीं भी नहीं हो पाता है | सम्यक शिक्षा प्रतिस्पर्धा और तुलना नहीं पैदा कर सकती है | वह तो प्रत्येक् व्यक्ति में जो छिपा है, उसे प्रकट करने का अवसर बनेगी | वह दूसरे की दौड़ नहीं, वरन स्वयं का विकास सिखाएगी | निश्चय ही व्यक्ति को विकास सिखाना है, लेकिन दूसरे से आगे बढ़ने की भ्रांत छाया में नहीं वरन स्वयं से ही प्रतिपल आगे बढ़ने के प्रकाश में | और यह कार्य प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के व्यक्तित्व की स्वीकृति, स्वयं में आनंदित होने की क्षमता, शांत होने की पात्रता और स्वयं में छिपी संभावनाओं की खोज को गति देकर किया जा सकता है | "
 
" धर्म नहीं ----सीखें प्रेम | क्योंकि जहाँ प्रेम है वहाँ धर्म है | "
सावित्री सदन, लश्कर (ग्वालियर), में संगोष्ठी :
5 अगस्त की सुबह आचार्यश्री. ने सावित्री सदन लश्कर में आयोजित एक विचार गोष्ठी को संबोधित किया | उन्होने कहा : " मेरा संदेश छोटा सा है | में प्रेम सीखना चाहता हूँ | क्योंकि प्रेम ही परमात्मा की प्रार्थना है | धर्म की जगह यदि हम प्रेम सीखें तो धर्म तो अपने आप ही आ जाता है | जहाँ प्रेम है, वहाँ धर्म है | "
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"सत्य की खोज तत्व-विचार नहीं है | वह है तत्वसाधना | क्योंकि सत्य तो सदा उपलब्‍ध है ——— वह तो सदा उपस्थित है, लेकिन हम इसे देख पाने में समर्थ नहीं है |"
जैन मित्र मंडल, ग्वालियर में,
आचार्यश्री. 5 अगस्त को पाटनी निवास पर आयोजित जैन मित्र मंडल की गोष्ठी में पधारे | उन्होंने वहाँ जिज्ञासुओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में कहा : " सत्य के संबंध में विचार करना नितांत व्यर्थ है | वह सत्य को जानने की राह नहीं है | वैचारिक अनुमानों से कोई कभी सत्यानुभूति तक न पहुँचा है, न पहुँच सकता है | वह दिशा बिल्कुल बांझ है | सत्य की तत्वचिंतता नहीं हो सकती है ——— हो सकती है तत्व-साधना | साधना आयाम ही दूसरा है | साधना में हम स्वयं पर कुछ करते हैं | सत्य पर कोरा विचार नहीं करते बल्कि स्वयं को रूपांतरित करने की दिशा में कदम उठाते हैं | चित्त अशांत है इसलिए हम अज्ञान में हैं | और चित्त जैसे ही शांत होता है , वैसे ही ज्ञान का सूर्योदय हो जाता है | इसलिए विचार कर करके स्वयं को और अशांत न करें | विचार छोड़कर निर्विचार हों और शांत हों तो जिसे विचार करके नहीं पाया जाता है वह निर्विचार होते ही ज्ञात होता है कि सदा से ही उपलब्ध है | अशांति के कारण हम उसे नहीं देख पाते थे | शांति के कारण वह प्यारा अनुभव बन जाता है | इसलिए में कहता हूँ : सत्य को नहीं, खोजें शांति को | क्योंकि शांति की अनुभूति ही सत्य की अनुभूति है | "
" मीटो , ताकि तुम हो सको | जिस क्षण अहंकार शून्य होता है, उसी क्षण कला पूर्ण हो जाती है | "
कलाकारों की संगोष्ठी, जबलपुर, में --
11 अगस्त को आचार्यश्री. ने जबलपुर के चित्रकारों की एक संगोष्ठी को संबोधित किया | जीवन की प्रत्येन दिशा में उनके बड़े अनूठे और मौलिक विचार हैं | उन्होंने कहा : " वह जीवन निरर्थक है, जो कि सृजन में संलग्न नहीं है | सृश्टा होकर ही मनुष्य स्वयं में छिपे सृश्टा का अनुभव कर पता है | इसलिए मेरे देखे तथाकथित सन्यासियों और व्यक्तियों से भी कलाकार कहीं ज़्यादा परमात्मा के निकट होते हैं | लेकिन यह निकटता उसी मात्रा में अधिक होती है जिस मात्रा में कलाकार अपने अहंकार से मुक्त होता जाता है | अहंकार ही कलाकार की मौत है | और जो कलाकार अहंकार को मृत्यु दे देता है , वह शाश्वत जीवन से संबद्ध हो जाता है | फिर तो वह बस एक उपकरण मात्र रह जाता है और उसके माध्‍यम से परमात्मा स्वयं प्रकट होने लगता है | इसलिए में तुमसे कहता हूँ ...(damaged)... हो सको | तुम्हारे होने में ही तुम्हारा मिटना है | और तुम्हारा मिटने में ही तुम्हारा होना है |
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" चित्त को बासा और पुराना और बूढ़ा मत बनाओ | सत्य को जानने के लिए चाहिए सतत नया और युवा चित्त | क्योंकि , सत्य सदा नया है | "
घाटकोपर, बंबई , में सत्संग :
आचार्यश्री. बहुत प्रतीक्षा के बाद 12, 13, 14, 15 अगस्त के लिए घाटकोपर पधारे | इस चतुर्दिवसिय सत्संग में हज़ारों लोगों ने उनकी अमृतवाणी सुनी | वे अपने साथ एक अलौकिक वायुमंडल लेकर ही जैसे चलते हैं | उनकी उपस्थिति ही जैसे एक क्रांति है | वे जो कहते हैं वह हजारों हृदयों में एसे ही प्रवेश कर जाता है जैसे गर्मी की उत्तप्त भूमि में पहली वर्षा की बूँदें | उन्होने यहाँ कहा : " मित्रों ! अतीत को छोड़ो | परंपराओं को छोड़ो | शास्त्रों और शब्दों को छोड़ो ———— ताकि तुम्हारी चेतना नयी हो सके , ताकि तुम नये हो सको | क्योंकि जो प्रतिपल नया नहीं है , वह परमात्मा को नहीं जान सकता है , क्योंकि वह तो प्रतिपल नया है | वह कभी बासा नहीं है | वह कभी पुराना नहीं है | और हम बासे हैं ——— पुराने हैं इसलिए उससे सम्मेलन नहीं हो पाता है | उसे जानने को तो सतत युवा चित्त चाहिए | और युवा चित्त कौन है ? वही जो कि प्रतिक्षण अतीत के प्रति मरता चलता है ——— वही जो कि अतीत को सिर पर नहीं ढोता है ---वही जो की अतीत को सिर पर बोझ नहीं वरन पार हो जाने का मार्ग बनाता है | क्या यह तुम नहीं कर सकते हो ? क्या अतीत की धूलि स्वयम् पर से झाड़ देनी इतनी कठिन है ? नही | प्रत्येक यह कर सकता है और नहीं कर सका है तो केवल इसलिए कि उसने यह करना नहीं चाहा है | "
 
" मनुष्य का मन दुष्पुर है | इसलिए जो उसे मारने निकलता है वह अंततः खाली रह जाता है | लेकिन, एक और दिशा भी है | वह है उसे खाली करने की | खाली करो और देखो | खाली होते ही पाया जाता है कि स्वयं प्रभु वहाँ विराजमान हैं | "
महिला महाविद्यालय, घाटकोपर , में
आचार्यश्री. 14 अगस्त की दोपहर महिला महाविद्यालय की छात्राओं को संबोधित करने के लिए यहाँ पधारे | उन्होंने यहाँ कहा : " मनुष्य का मन दुश्पूर है | उसे कितना ही भरो लेकिन वह खाली ही रह जाता है | वह न धन से भरता है, न पद से, न प्रतिष्ठा से | वह भरता ही नहीं है | फिर अंततः मनुष्य उसे परमात्मा से भरना चाहता है | वह उससे भी नहीं भरता है | शायद भरना उसका स्वाभाव ही नहीं है | या शायद वह पूर्व से ही भरा हुआ है और इसलिए हमारी उसे भरने की सारी चेष्टाएँ असफल हो जातीं हैं | में एक और दिशा सुझाता हूँ : मन को भरें न ———— बल्कि खाली करें | और ….(damaged).... का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि खाली होते ही पाया जाता है कि मन के मंदिर में तो ….(damaged).... हैं | "
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" स्वयं को बदलें | क्योंकि, समाज व्यक्ति और व्यक्ति के जोड़ से ज़्यादा नहीं है | "
गाडरवारा में विद्यार्थियों के बीच
आचार्यश्री. 19, 20, 21, 22 अगस्त के लिए अपनी जन्मभूमि गाडरवारा पधारे | उन्होंने यहाँ विद्यार्थियों की एक विशाल सभा को संबोधित किया | उसी विद्यालय में उनकी अमृतवाणी को सुनना जहाँ कि वे कभी पढ़ते थे, एक अपूर्व आनंद था | उन्होंने यहाँ कहा : " विश्व बड़े संकट में है | और यह संकट बाहर से नहीं, मनुष्य के भीतर से ही पैदा हुआ है | मनुष्य की अशांत और द्वंदग्रस्त चित्तस्थिति अंततः समस्त मानवजाति का आत्मघात बनने को है | क्या हम इस संबंध में निरीह दर्शक ही रहेंगे ——— और कुछ कर न सकेंगे ? प्रत्येक व्यक्ति के सहयोग से ही यह संकट आया है | इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के असहयोग से ही यह संकट टल भी सकता है | मैं अशांत हूँ तो मैं एक अशांत जगत के निर्माण में सहयोगी हूँ | और यदि मैं शांत हो जाता हूँ तो निश्चित ही मैं एक शांत मनुष्यता के लिए आधार बनता हूँ | व्यक्ति और व्यक्ति के जोड़ से समाज ज़्यादा नहीं है | इसलिए व्यक्ति की अंतस क्रांति ही मूलतः वास्तविक क्रांति है | स्वयं को बदलने में लगें तो आप समाज को बदलने में लग जाते हैं |"
 
" स्वयं को जानना है ? आनंद को उपलब्ध करना है ? तो चित्त को विश्राम में ले चलें | जीवन में जो भी सत्य है, शिव है, सुंदर है —— सभी का द्वार शांत चित्त है | "
जीवन जाग्रति केंद्र संगोष्ठी, गादरवारा :
22 अगस्त की रात्रि आचार्यश्री. के निकट सान्निद्य के लिए जीवन जाग्रति केंद्र द्वारा एक सांगोष्ठी आयोजित की गई | इसमें जिज्ञासुओं की एक बड़ी संख्या ने भाग लिया | आचार्यश्री ने अपने विचार भी प्रकट किए और शंकाओं का समाधान भी किया | उन्होंने कहा : " मनुष्य के जीवन का मूल दुख क्या है ? अशांति और तनाव | और अशांति और तनाव क्यों है ? क्योंकि, हम चित्त को विश्राम देना ही भूल गये हैं | शरीर तो विश्राम करता भी है लेकिन चित्त को तो कोई विश्राम है ही नहीं | उसे तो हम निरंतर जीवन के कोल्हू में जोते रखते हैं | कोल्हू के बैल भी रात्रि को विश्राम करते हैं, लेकिन चित्त तो रात्रि भी सक्रिय होता है | वह तो रात्रि भी स्वप्न देखता है ——— क्रोध करता है, भयभीत होता है, चिंतित होता है | चित्त पर यह अतिभार ही व्यक्तित्व के समस्त संगीत को नष्ट कर देता है | और फिर एसा अशांत और थका हुआ मन सत्य को या स्वयं को जानने में भी असमर्थ हो जाता है तो कोई आश्चर्य नहीं है | इसलिए मैं एक ही साधना के लिए प्रार्थना करता हूँ और वह है चित्त को विश्राम देने की | ….(damaged).... उतना चित्त को विश्राम दें | उसे खाली छोड़ें | किन्हीं क्षणों में बस चुपचाप मौन चित्त
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को देखते रह जावें | देखते-देखते ही वह शांत होता जाता है | और फिर एक दिन जब वह पूर्ण शांति और विश्राम में होता है तो उसके दर्शन होते हैं जो कि मैं हूँ | और यह दर्शन सारे जीवन को आमूल ही बदल डालता है | यह अनुभूति दुख की जगह आनंद में प्रतिष्ठा बन जाती है | "
" सत्य के सागर को पाना है तो जिज्ञासा की जीवंत और सतत प्रवाहमान सरिता बनो ——— विश्वासों, मान्यताओं और पूर्वाग्रहों के बंद और मृत सरोवर नहीं | "
जीवन जाग्रति केंद्र संगोष्ठी, जबलपुर
26 अगस्त की रात्रि आचार्यश्री. के सान्निध्य में जीवन जाग्रति केंद्र की संगोष्ठी आयोजित हुई | जिज्ञासुओं से हाल खचाखच भरा हुआ था | और हाल के बाहर भी अनेक व्यक्तियों को खड़े रहकर चर्चा सुननी पड़ी | आचार्यश्री ने पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दिये | उन्होंने कहा : " सत्य की खोज का पथ सतत जिज्ञासा का पथ है | जैसे सरिताएँ सतत सागर की ओर बढ़ती रहती हैं एसे ही जिज्ञासा भी निरंतर सत्य की ओर बहती रहनी चाहिए | मन विश्वासों, धारणाओं और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो तब एसा हो सकता है | जिनके चित्त किन्हीं मान्यताओं में आबद्द हो जाते हैं, उनकी गति अवरुद्ध हो जाती है | फिर वे प्रवाहमान सरिता न रहकर बंद सरोवर हो जाते हैं | सत्य के सागर से उनका मिलन असंभव हो जाता है | और जिसके जीवन में सत्य के सागर में मिलन नहीं होता है, वह एक अबूझ पीड़ा और दुख और व्यर्थता से भरा रह जाता है | इसलिए मैं कहता हूँ : स्‍वयं को खुला हुआ रखो ——— सब भाँति मुक्त और सतत प्रवाहमान ——— ताकि एकदिन वह उपलब्ध हो सके जिसके लिए प्राण प्यासे और आतुर हैं | "
" अहंकार जहाँ है, वहाँ सृजन कहाँ ? अहंकार सृजन का नहीं, विध्वंस का सूत्र है | कला का सत्य तो वहीं होता है जहाँ व्यक्ति स्वयं से शून्य और मुक्त हो जाता है | "
कलानिकेतन, जबलपुर, में कलाकारों के मध्य संगोष्ठी
मध्यप्रदेश राजकीय चित्रकला प्रदर्शनी के समारोह दिवस पर आचार्यश्री के सान्निध्य में 27 अगस्त की रात्रि कलाकारों की एक संगोष्ठी आयोजित हुई | आचार्यश्री ने कला और जीवन पर अपने विचार प्रस्तुत किये और कलाकारों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दिये | उन्होंने यहाँ कहा : " जीवन में सत्य, शिव और सुंदर की अनुभूति केवल उन्हें (ही) उपलब्ध होती है, जो सबभाँति स्वयं से रिक्त हो जाते हैं | अहंकार से भरा हुआ व्यक्ति
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अँधा और बहरा होता है | उसे न कुछ दिखाई पड़ता है, न सुनाई पड़ता है | वह जीवन को जानने से वंचित ही रह जाता है | इसलिए अहंकार से कला का जोड़ नहीं होता है | अहंकार सृजनात्मक ही नहीं है | वस्तुतः तो वही विध्वंस का मूल मंत्र है | मेरे देखे : अहंकार और सृजन दोनों विरोधी आयाम हैं | अहंकार शून्यता के क्षण ही सृजन के क्षण हैं | और इन क्षणों में जिसका जन्म होता है, वह यदि शाश्वत हो जाता हो तो आश्चर्य नहींहै क्योंकि अहंकार जहाँ नहीं है, वहाँ आत्मा के शाश्वत स्वर सहज ही सुने जाते हैं |"
' बीज की सार्थकता बीज में ही नहीं है | वरन उन फलों और फूलों में है जो कि वह बन सकता है | और यही जीवन के संबंध में भी सत्य है |"
पूना में सत्संग :
आचार्यश्री. 3 और 4 सितंबर के लिए पूना पधारे | उन्होंने 3 और 4 सितंबर की सुबह " जीवन क्रांति की भूमिका " पर अपने विचार प्रकट किए | उन्हें सुनने के लिए एक विशाल जनसमूह उमड़ पड़ा था | लेकिन उहें सुनने की आतूरता के कारण हज़ारों व्यक्तियों की भीड़ में भी एसा सन्नाटा होता है कि जैसे वहाँ कोई भी न हो | शांति का यह दृश्य देखते ही बनता है | और इस शांतिपुर्णा वातावरण में उनके अमृत शब्द सीधे हृदय में उतर जाते हैं | शायद वे मस्तिष्क से नहीं, वार्न सीधे हृदय से ही बातचीत करते हैं | उनका प्रभाव अपूर्व है और उसे व्यक्त करने के लिए शब्द खोजना भी कठिन हो जाता है | उन्होंने यहाँ कहा : " जीवन को वैसे ही स्वीकार नहीं कर लेना है जैसा कि वह उपलब्ध होता है | जन्म के साथ जो जीवन मिलता है वह तो एक बीज की भाँति है | उस बीज को ही सम्हालकर जो बैठ जाता है, वह तो पागल ही है | क्योंकि, बीज की सार्थकता अपने आप में नहीं है | उसकी सार्थकता तो उन फूलों और फलों में है जो कि वह बन सकता है |"
"मनुष्य के प्रति हम अभी भी अवैज्ञानिक हैं | और यही वह भूल है जिसके कारण मनुष्य हज़ारों समस्याओं और विक्षिप्तताओं में जी रहा है |"
पूना में महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के बीच :
3 सितंबर की रात्रि आचार्यश्री. महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के बीच पधारे | विद्यार्थी युवकों ने उनकी बातें अत्यंत प्रेम और आनंद से सुनी और उनसे अपनी बहुत सी समस्याओं
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के समाधान भी पूछे | आचार्यश्री. ने यहाँ कहा : " एक नये मनुष्य को जन्म देना है | पुराना मनुष्य स्वस्थ सिद्ध नहीं हो सका | उसकी रुग्णता बहुमुखी थी | वह ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा और मद में ही आजतक जीता रहा है | उसकी पूरी कथा एक लंबी विक्षिप्तता की कथा है | और स्वस्थ मनुष्य क्यों पैदा नहीं हो सका ? क्योंकि, मनुष्य के संबंध में हम अबतक वैज्ञानिक नहीं हो पाय हैं | मनुष्य के प्रति हम अबतक अंधविश्वासी और अवैज्ञानिक ही बने हुए हैं | पदार्थ-मात्र के प्रति जितनी समझ का हमने परिचय दिया है, उतनी समझ का परिचय हम स्वयम् के प्रति नहीं दे पाये है | और यही हमारी भूल है | "
" मनुष्य सोया हुआ है क्योंकि मनुष्य स्वयं को ही नहीं जानता है | यह कैसे ही सकता है कि जागा हुआ व्यक्ति और स्वयं को ही ना जाने ? जागरण और आत्मज्ञान एक ही अनुभव के दो नाम हैं |"
अहमदाबाद में सत्संग :
आचार्यश्री. पर्यूषण व्याख्यानमाला के अंतर्गत 5, 6, 7 सितंबर के लिए अहमदाबाद पधारे | इस त्रिदिवसिय सत्संग में हज़ारों नरनारियों ने उनके अमृतवचन सुने | एच. बी. आर्ट्स कालेज के सभाभवन में और उसके बाहर एसी भीड़ शायद ही कभी देखी गई हो | उनका कांतिघोष लोगों की निद्रा तोड़ रहा है | और वे देश के एक कोने से दूसरे कोने में बोलते हुए सतत घूम रहे हैं | उनका यह धर्म-चक्र-प्रवर्तन देश की चेतना में गहरे परिणाम लाएगा यह सुनिश्चित है | उन्होने यहाँ कहा : " मैं मनुष्य को सोया हुआ देखता हूँ | हम सब सोए हुए हैं | और इसलिए तो जीवन अपरिचित और अनजाना और व्यर्थ ही बीत जाता है | और सोया हुआ मनुष्य भी कोई मनुष्य है ? और सोया हुआ जीवन भी कोई जीवन है ? लेकिन मेरा सोए हुए होने से क्या अर्थ है ? जो स्स्वयं को नहीं जानता है, उसे मैं सोया हुआ कहता हूँ | यह कैसे हो सकता है कि जागा हुआ व्यक्ति और स्वयं को ही न जाने ? जागरण और आत्मज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं |"
" जीवन में बहुत आनंद है —— लेकिन केवल उन्हीं के लिए जिसके पास उसे भर लेने वाला पात्र है | उस पात्र का नाम है : शांति | "
अहमदाबाद में हाईस्कूल के विद्यार्थियों के बीच :
आचार्यश्री. 5 सितंबर की दोपहर हाईस्कूल के विद्यार्थीयों के बीच बोलने पधारे | उन्होने
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विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा : " जीवन आनंदोपलब्धि का अवसर है | लेकिन इस आनंद को केवल वे ही उपलब्ध हो सकते हैं जो की शांत हों | शांति आनंद को पाने की अनिवार्य शर्त है | भीतर शांति हो तो बाहर आनंद है | भीतर अशांति हो तो बाहर दुख है | लेकिन हम जीवन को उल्टा देखते हैं ——— हम भीतर से बाहर की और न देखकर बाहर से भीतर की और देखते हैं और इसी भूल में जीवन व्यर्थ हो जाता है | हम देखते हैं कि बाहर दुख है इसलिए भीतर अशांति है | बाहर आनंद है इसलिए भीतर शांति है | यह भूल बहुत महँगी पड़ती है क्योंकि इसके आधार पर चलनेवाला कभी भी आनंद को उपलब्ध नहीं हो पाता है | "
" परमात्मा क्या है ? प्रेम ——- प्रेम की अत्यंतिक अनुभूति ही परमात्मा है | "
संस्कारतीर्थ, आजोल, में प्रवचन :
आचार्यश्री. 6 सितंबर की दोपहर संस्कारतीर्थ, आजोल, पधारे | संस्कारतीर्थ की बहिनों ने उनका हार्दिक स्वागत किया | वे उनके शब्दों से परिचित थीं और उनके दर्शन के लिए बहुत समय से प्रतीक्षारत | आचार्यश्री के आगमन से यह दिवस संस्कारतीर्थ के लिए एक आनन्दोत्सव में परिणत हो गया था | आचार्यश्री. ने यहाँ कहा : "प्रेम प्रार्थना है क्योंकि प्रेम परमात्मा तक पहुँचने का द्वार है | जो प्रेम में प्रतिष्ठित हैं, वे परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं | इसलिए मैं कहता हूँ : परमात्मा को नहीं, प्रेम को खोजो क्योंकि जो प्रेम को पा लेता है , वह परमात्मा को तो पा ही लेता है | क्योंकि प्रेम की आत्यांतिक अनुभूति का नाम ही परमात्मा है | "
"धर्म है जीवन-वीणा को बजाने की कला | और जो इस कला से अपरिचित है, वह जीवन-संगीत से भी अपरिचित रह जाता है |"
अहमदाबाद के महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के बीच :
7 सितंबर की दोपहर आचार्यश्री. ने महाविद्यालयीन विद्यार्थियों को संबोधित किया | अनेक नागरिक भी इस जनसभा में उपस्थित हुए थे | आचार्यश्री. ने यहाँ कहा : " जीवन तो एक वीणा ...(damaged)... है | वीणा होने से भी कुछ नहीं होता है | उसे बजाना भी आना चाहिए | धर्म जीवन
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-वीणा को बजाने की कला है | और जिसे यह कला नहीं आती है, वह वीणा लिए बैठा रह जाता है और उसे स्वप्न में भी ज्ञान नहीं हो पाता है कि कैसा अपार्थिव संगीत उस पार्थिव यंत्र में छिपा हुआ था ? "
" प्रभु तो द्वार पर खड़ा है लेकिन हम सोए हुए हैं | मित्रों ! जागो और देखो कि द्वार पर कौन खड़ा है ? "
बंबई पर्यूषण व्याख्यानमाला में :
आचार्यश्री. 8 सितंबर की सुबह बिरला क्रीड़ा केंद्र, चौपाटी, पर आयोजित पर्यूषण व्याख्यानमाला के अंतिम दिवस बोलने के लिए पधारे | उन्हें सुनने के लिए विशाल जनसागर उमड़ पड़ा | बिरला क्रीड़ा केंद्र का सभाभवन तो इंच-इंच भरा ही हुआ था | भवन के बाहर भी सैकड़ों लोग इकट्ठे थे | जनसमूह की एसी भावदशा देखकर स्पष्ट समझ में आता है कि लोगों कि धर्म में रूचि कम नहीं है लेकिन धर्म के नाम पर चलते पाखंड में ज़रूर अरुचि हो गई है | और इसलिए जहाँ भी उन्हें सत्य के दर्शन होते हैं, वे वहाँ प्यासे लोगों की भाँति इकट्ठे हो जाते हैं | आचार्यश्री. ने यहाँ कहा : " प्रभु तो निरंतर हमारे द्वार पर ही खड़ा है, लेकिन हमारे हृदय के द्वार बंद हैं और भीतर हम सोये हुए है | उसे जानना है तो हृदय के द्वार खोलने होंगे और जागना होगा | और यह जागने की साधना कोई दूसरा किसी के लिए नहीं कर सकता है | प्रत्येक को ही स्वयं यह काम करना है | शरीर की या मन की प्रत्येक क्रिया होश में —— जागृत होकर, स्मृतिपूर्वक करने से चित्त क्रमशः निद्रा के बाहर आ जाता है | और निद्रा के बाहर आना ही प्रभु में प्रवेश है | "
" आजीविका ही जीवन नहीं है | वह तो साधन को ही साध्य समझ लेना है | जीवन कुछ और ही है | और उसे जानने के लिए खुद से विराट की और गति आवश्यक है | "
बंबई विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच :
8 सितंबर की दोपहर आचार्यश्री. विश्वविद्यालय के विद्यार्थीओं के बीच बोलने यूनिवर्सिटी क्लब में पधारे | विद्यार्थियों ने उनका हार्दिक स्वागत किया | आचर्यश्री. ने यहाँ कहा : " शिक्षा का केंद्रीय लक्ष्य क्या है ? जीवनमूल्यों की शिक्षा ही न ? क्षुद्र से चित्त विराट की ओर गतिमय हो, पार्थिव से अपार्थिव की ओर, शरीर से आत्मा की ओर, अंधकार से आलोक (की ओर) —— यही न ? लेकिन आज यह कहाँ हो रहा है ? शिक्षित व्यक्ति प्रतीत होता है कि
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अधूरा ही शिक्षित है | शायद वह आजीविका कमा लेता है | लेकिन क्या आजीविका कमा लेना ही जीवन को अभी पा लेना है ? मित्र ! नही | आजीविका ( Living ) ही जीवन ( Life ) नहीं है | रोटी पा लेना ही सबकुछ पा लेना नहीं है | रोटी ज़रूरी है | उसके बिना जीना कठिन है | लेकिन अकेली रोटी पर ही जीना तो और भी कठिन है | कठिन ही नहीं वैसा जीना व्यर्थ भी है | आज जो मनोजगत में अर्थहीनता का अनुभव हो रहा है वह इस कारण ही हो रहा है | वह जीवन का कुसूर नहीं है | हमारी ही भूल है | "
" आत्मा के विकास की भूमिका है स्वतंत्रता | क्योंकि स्वतंत्रता में ही स्वयं में जो छिपा है, वह प्रगट होता है | स्वयं को स्वतंत्र बनाने में जो समर्थ है, वह जीवन-विकास के चरम शिखर छूने में भी समर्थ हो जाता है | "
जबलपुर विज्ञान महाविद्यालय के अशोक छात्रावास में :
11 सितंबर की संध्या आचार्यश्री. विज्ञान महाविद्यालय के विद्यार्थियों के उदबोधन हेतु अशोक छात्रावास में पधारे | विद्यार्थी तो सदा ही उनके विचार अत्यंत ही आदर से सुनते हैं | क्योंकि उनकी वाणी में नये युग का आवाहन है | और अतीत से मुक्ति के लिए ही उनके सारे प्रयास हैं | वे मनुष्य की चेतना को नित नया और युवा देखना चाहते हैं | उन्होंने यहाँ कहा भी : " जीवन-उर्जा सदा युक्त, नयी और बंधन हीन होनी चाहिए | उसकी परिपूर्ण स्वतंत्रता में ही उसका विकास है | स्वतंत्रता की भूमि में ही सत्य के बीज अंकुरित होते हैं | और स्वतन्त्रता के आलोक में ही स्वयं में जो छिपा है वह प्रकट होता है | इसलिए स्वयं की चेतना को सब भाँति स्वतन्त्र बनाये रखने को ही मैं साधना कहता हूँ | "
" काश ! वह जो भीतर है, उसे पा सके तो प्रत्येक व्यक्ति एक सम्राट है | अन्यथा, सभी भिखारी है, वे भी जो कि बह्यसंपदा के कारण स्वयं को सम्राट स्मझते हैं | "
महावीर लायब्रेरी, जबलपुर , में प्रवचन :
12 सितंबर की रात्रि आचर्यश्री. महावीर लायब्रेरी में बोलने पधारे | उन्हें सुनने के लिए आतुर लोगों से भवन खचाखच भर गया था | भवन के बाहर सड़क पर भी एक घंटे तक विशाल भीड़ उन्हें खड़े होकर सुनती रही | उन्होंने यहाँ कहा : " मनुष्य में अपरिमित खजाने छिपे हैं | लेकिन हम तो भीतर की ओर देखते ही नहीं हैं और इसलिए जो हमारा स्वरूपसिद्ध अधिकार है उससे भी हम वंचित रह जाते हैं | काश ! वह जो भीतर है, उसे जाना जा सके तो प्रत्येक
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व्यक्ति एक सम्राट है | अन्यथा सभी भिखारी हैं, वे भी जो बाहर की संपदा के कारण स्वयं को सम्राट मानते हैं | "
" साक्षी बनें | मन के तटस्थ साक्षी बनें | क्योंकि, वही मार्ग है मन की परिपूर्ण शांति पाने का | और स्मरण रखें कि जहाँ शांति है वहीं सब कुछ है ——-- आनंद भी, आलोक भी , अमृत्तत्व भी | "
जबलपुर दशलक्षण व्यायामशाला में :
आचार्यश्री. 13 सितंबर की रात्रि दशलक्षण व्यायामशाला में बोलने पधारे | वर्षा हो रही थी तो भी इतने लोग उन्हें सुनने आए थे कि हाल में बैठने को स्थान नही था | वर्षा में बाहर खड़े रहकर भी अनेक लोगों ने उनकी अमृतवाणी को सुना | उन्होंने कहा : " सत्य का चंद्रमा तो सभी झीलों के उपर चमक रहा है | लेकिन जो झीलें अशांत हैं, उनमें वह प्रतिबिंबित नहीं हो सकेगा | शांत झीलें ज़रूर उसे अपना अतिथि बना लेंगी | आपका मन कैसा है ? शांत झील की भाँति या अशांत झील की भाँति | क्योंकि आपके मन पर ही सबकुछ निर्भर है | शांत मन सत्य के लिए दर्पण बन जाता है | और सत्य की छाया में मिलता है आनंद, आलोक , अमृतत्व | इसलिए मन की शांति को उपलब्ध हों ——— वही है धर्म, वही है योग, वही है जीवन का सार विज्ञान | और मन की शांति पाने के लिए क्या करें ? मन के साक्षी बनें ———— तटस्थ साक्षी | मन के प्रवाह के किनारे बैठकर देखें ——— सिर्फ़ देखें, उस सरिता को | और देखते-देखते ही पाया जाता है कि मन क्रमशः शांत होता जाता है | और जिस क्षण भी मन शांत है उसीक्षण उसकी झलकें मिलनी शुरू हो जाती हैं जो कि सत्य है जो कि स्वयं का स्वरूप है | "
" मैं सीखाना चाहता हूँ : मौन ———— निःशब्द मौन | क्योंकि, उसी मौन में वह जाना जाता है जो कि जीवन में सत्य है, सुंदर है, श्रेष्ठ है | "
जबलपुर मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच :
आचार्यश्री. 14 सितंबर की रात्रि मेडिकल कॉलेज में पधारे | मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों और अध्यापकों ने उनका हार्दिक स्वागत किया | उनकी विवेक सम्मत वाणी से विद्यार्थियों के हृदय तो आंदोलित हो जाते हैं | उन्होनें यहाँ कहा : " शास्त्र का मूल्य नहीं है | मूल्य है सत्य का | और जो शास्त्रों में भटक जाता है, वह सत्य को उपलब्ध नहीं हो पाता है | क्योंकि शास्त्र में शब्द है —— और सत्यानुभूति के लिए होना पड़ता है : निःशब्द, मौन, शून्य | क्या मित्रों ! कभी तुमने उस मौन को जाना है, जहाँ कि शब्द होते ही नहीं हैं ? मैं वही मौन तुम्हें सीखाना चाहता हूँ ...(damaged)... उसी मौन में वह सब जाना जाता है जो जीवन में सुंदर है, सत्य है, श्रेष्ठ है | "
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" सत्य की यात्रा का पहला प्रस्थान बिंदु है विचार | श्रद्धा और विश्वास नहीं ———- चाहिए विचार ——— तीव्र विचार | विचार के पंख जिसके पास नहीं हैं , वह सत्य के मुक्त आकाश में उड़ना भी चाहे तो कैसे उड़ सकता है ? "
बालासिनोर में प्रथम प्रवचन :
आचार्यश्री. 17 सितंबर की प्रभातवेला में बालासिनोर पधारे | उन्होंने सुबह ही नागरिकों की एक सभा को संबोधित किया | इस नगर में बहुत दिनों से उनकी प्रतीक्षा थी | उनके क्रांतिकारी शब्द तो देश के कोने-कोने में उनके बिना पहुँचे ही पहुँच गये हैं | और जहाँ भी विचारशील लोग हैं, वहीं उनकी प्रतीक्षा की जा रही है | बालासिनोर का बुद्धिजीवी वर्ग भी इस प्रतीक्षा में पीछे नहीं था | आचार्यश्री. ने अपने प्रथम उद्बोधन में ही कहा : " श्रद्धा और विश्वास में जो भी बँधा है , वह जीवन के सत्य को नहीं जान सकता है | उसने तो अपने ही हाथों अपने पंख काट लिए हैं | आकाश में उड़ाने के लिए जैसे पंख चाहिए एसे ही सत्य को जानने के लिए तीव्र विचार और विवेक की क्षमता चाहिए | विश्वासी के भीतर यह क्षमता कुंठित ही हो जाती है | दूसरों पर विश्वास के कारण वह स्वयं की इस क्षमता का उपयोग ही नहीं कर पाता है | इसलिए सबसे पहले तो मैं विचार करने के लिए प्रार्थना करता हूँ | विचार सत्य की यात्रा का पहला प्रस्थान बिंदु है | "
" विचार की अग्नि में जल जाता है विश्वासों का कूड़ा-कचरा | और फिर जलाए जाने को कुछ न मिलने पर वह अग्नि भी बुझ जाती है | और तभी —— उसी निर्विचार में वह वह जाना जाता है —— जो कि है | "
बालासिनोर में द्वितीय प्रवचन :
17 सितंबर के मध्यान में आचार्यश्री. का दूसरा प्रवचन यहाँ हुआ | उन्होने कहा : " विचार की तीव्र अग्नि में विश्वासों के कूड़े-कचरे को जला डालो | और फिर तुम पाओगे कि जब जलाने को कुछ भी नहीं बचता है तो जैसे अग्नि स्वयं बुझ जाती है, एसे ही विचार भी स्वयं विलीन हो जाता है | और तब उस निर्विचार दशा में ही वह जाना जाता है जो कि है | "
" देखो —— भीतर देखो | चित्त की निष्कंप दशा ही भीतर देखनेवाली आँख है | और स्मरण रखना कि जो भीतर देखने में समर्थ हो जाता है, उसके जीवन से अंधकार सदा के लिए विदा हो जाता है | "
बालासिनोर में वियार्थीयों के बीच :
१८ सितंबर की प्रभातवेला में विद्यार्थियों की एक विशाल सभा को आचार्यश्री. ने संबोधित किया |


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खुले आँगन में वृक्षों की छाया तले हुई यह सभा बड़ी अलौकिक थी | आचार्यश्री. तो अंधेरे में एक दिए की भाँति हैं | उनमें तो सहज ही आलोक किरणें विकर्ण होती रहती हैं | लेकिन जब प्यासे हृदय उनके निकट होते हैं तब तो जैसे ज्ञान की गंगा ही उनमें बहने लगती है | उन्होंने यहाँ कहा : " मनुष्य जाति का इतिहास दुखों और पीड़ाओं का इतिहास है | अंधकार में ही हम अबतक भटकते रहे हैं | जबकि प्रकाश का अविनाशी स्त्रोत प्रत्येक के भीतर है | लेकिन हम प्रकाश को बाहर खोजते रहे हैं और इसलिए ही उसे नहीं पा सके हैं | देखो ! भीतर देखो ——— और तुम इसे ज़रूर पा लोगे | मैं पाकर ही यह कह रहा हूँ | लेकिन तुम पुछोगे कि भीतर कैसे देखें ? मौन, शांति, शून्‍य है भीतर देखने की आँख | चुप हो जाओ और भीतर खोजो | एक शब्द भी भीतर न हो ———— विचार का एक कंपन भी न हो | और उसी निष्कंप दशा में तुम उसे पा लोगे जो कि तुम हो | और उसे पाते ही जीवन से सारा अंधकार सदा के लिए विदा हो जाता है | "
" संदेह ---- सम्यक और जीवंत संदेह ही निःसंदेह ज्ञान तक ले जाने वाला सेतु है | विश्वासी चित्त तो चलता ही नहीं , उसके कहीं पहुँचने का तो सवाल ही नहीं है | "


नाडियाद में महाविद्यालयों के आद्यापकों के बीच :
18 सितंबर की दोपहर आचर्यश्री. नाडियाद पधारे | आते ही उन्होंने महाविद्यालयों के अध्यापकों के की एक सभा को संबोधित किया | अध्यापकों ने उनकी वाणी का अत्यंत प्रेमपूर्ण स्वागत किया | आचार्यश्री. ने कहा कि : " मैं श्रद्धा नहीं, संदेह सिखाता हूँ | क्योंकि श्रद्धा जड़ता लाती है और संदेह खोज में ले जाता है | संदेह अत्यंत जीवंत प्रक्रिया है | उससे ग़ुजरकर कोई निसंदिग्ध ज्ञान तक भी पहुँच सकता है | लेकिन, विश्वास करने वाला चित्त यात्रा ही नहीं करता है | इसके कहीं पहुँचाने का तो सवाल ही नहीं है | "
" बाहर है मृत्यु लेकिन भीतर ——— भीतर कोई मृत्यु नहीं है | वहाँ तो जीवनों का जीवन विराजमान है | लेकिन जो खोजता है , वही उसे पाता है | "
नाडियाद में जनसभा :
18 सितंबर की रात्रि आचार्यश्री. ने टाउनहाल में आयोजित विशाल जनसभा को उद्बोधित किया | सर्वप्रथम नाडियाद के नागरिकों की और से उनका भावभीना स्वागत किया गया और उनके (क्रांतिकारी) व्यक्तित्व और विचारों का परिचय दिया गया | तत्पश्चात आचार्यश्री. ने अपने प्रवचन में ...(damaged)... की खोज में खो देते हैं | और वो हमारे भीतर ही है
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उसे हम बाहर की दौड़ में खो देते हैं | एसे जीवन रिक्त होता है और मृत्यु निकट आती है | मैं पूछना चाहता हूँ कि इस तथाकथित जीवन में हम मृत्यु के अतिरिक्त और क्या उपलब्ध कर पाते हैं ? क्या यह बहुत अजीब सी बात नहीं है कि जीवन की खोज और दौड़ में अंततः मृत्यु हाथ में आती हो ? होना तो उल्टा ही चाहिए | होना तो चाहिए कि जीवन अमृतत्व को उपलब्ध हो ! तो ही हम उसे सफल भी कह सकते हैं | लेकिन निराश होने का कोई कारण नहीं है ! जीवन अमृतत्व को उपलब्ध हो सकता है | काश ! हम स्वयं की गहराइयों में उसे खोजें तो वह तो अमृत है ही | बाहर है मृत्यु लेकिन भीतर कोई मृत्‍यु नहीं है | "
" मनुष्य जो खोजता है वही हो जाता है | उसकी खोज ———— उसकी आकांक्षा ———— उसकी प्यास ही अंततः उसकी प्राप्ति बन जाती है | क्षुद्र को जो खोजता है वह क्षुद्र हो जाता है, और विराट को जो खोजता है वह विराट हो जाता है | "
नाडियाद महिला महाविद्यालय में :
19 सितंबर की सुबह आचार्यश्री. ने महाविद्यालयीन छात्राओं की विशाल सभा को संबोधित किया | आचार्यश्री. के शब्द तो जैसे एक कविता हैं और उनकी वाणी तो जैसे एक संगीत है | वे अपने विचारों के संगीत में सबको पृथ्वी से स्वर्ग की ओर बहा ले जाने में सफल हो जाते हैं | आह ! थोड़ी देर को एक और ही जगत निर्मित हो जाता है | आचार्यश्री. ने यहाँ कहा : " भिखारी बनना है या सम्राट ? भिखारी बनना हो तो क्षुद्र की खोज करो और सम्राट बनना हो तो विराट की | क्योंकि क्षुद्र की खोज में खोजनेवाला भी क्षुद्र हो जाता है और विराट की खोज में विराट | मनुष्य जो खोजता है, वही हो जाता है | "
" परमात्मा के द्वार को खोल लेना अत्यंत सरल है | शर्त एक ही है : क्या आपके पास शांति की कुंजी है ? "
नाडियाद महाविद्यालय के छात्रों की विशाल सभा :
19 सितंबर की दोपहर आचार्यश्री. महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के उद्द्बोधन के लिए पधारे | हज़ारों विद्यार्थियों ने उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुना | उन्होने यहाँ कहा : " परमात्मा के द्वार को खोल लेना अत्यंत सरल है | लेकिन ठीक कुंजी न हो तो ज़रूर कठिन हो जाता है | और कुंजी कहाँ है ? कुंजी है प्रत्येक व्यक्ति स्वयं | अशांत व्यक्ति ठीक कुंजी नहीं है | शांत व्यक्ति ठीक कुंजी है | शांति की कुंजी से ही सत्य के द्वार पर लगा ताला खुलता है |
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" धर्म को बचाना है | लेकिन किसके ? अधार्मिकों से ? नहीं , तथाकथित धार्मिकों और धर्मों से ही धर्म को बचाना है | "
कपडवज लायंस क्लब में :
आचार्यश्री. 19 सितंबर की संध्या कपडवज पधारे | लायंस क्लब कीओर से उनका भव्य स्वागत किया गया | रात्रि में क्लब द्वारा आयोजित सभा में उन्होंने कहा : " जीवन धर्म से विहीन हो गया है | और यह आधार्मिकों के कारण नहीं हुआ है | यह हुआ है धर्म के नाम पर चलते पाखंडों के कारण | उनकी ही प्रतिक्रिया स्वरूप लोग धर्मविमुख हो गये हैं | धर्म पाखंड से मुक्त हो तो मनुष्य पुनः धार्मिक हो सकता है | धर्म को तथाकथित धर्मों और धार्मिकों से बचना है | सभी सोचविचारशील व्यक्तियों के समक्ष आज इससे बड़ा और कोई पुनीत कार्य नहीं है | "
" जन्म ही जीवन नहीं है | और न मृत्यु ही जीवन की समाप्ति है | जो जीवन को जान लेता है वह तो पाता है कि जन्म और मृत्यु वस्त्रों की बदलाहट से ज़्यादा नहीं है | "
कपडवज महाविद्यालय में :
20 सितंबर की सुबह आचार्यश्री. ने महाविद्यालय के विद्यार्थियों को संबोधित किया | अत्यंत शांति में संपन्न हुई इस सभा में उन्होंने कहा : " जीवन एक कला है | कला ही नहीं परम कला है | जीवन भी सीखना पड़ता है | वह भी रेडीमेड नहीं मिलता है | उसे भी बनाना और निर्मित करना होता है | और जो व्यक्ति जन्म को ही जीवन मानकर रुक जाते हैं, वे जीवन को न जान पाते हैं और न ही जी पाते हैं | जन्म ही जीवन नहीं है | जीवन तो जन्म के भी पूर्व है | जीवन तो मृत्यु के भी पश्चात है | जन्म और मृत्यु तो जीवन के ही मध्य में घटी दो घटनाएँ हैं | और जो जीवन को जान लेता है, वह तो जानता है कि जन्म और मृत्यु वस्त्रों की बदलाहट से ज़्यादा नहीं है | "
" देखो ———— जीवन के रहस्य को देखो | क्योंकि, रहस्यानुभूति में ही छिपा है धर्म | रहस्य में ही छिपा है प्रभु | रहस्य में ही छिपा है सत्य | "
कपडवज में नागरिकों की विशाल सभा :
20 सितंबर की रात्रि टाउनहाल में आचार्यश्री. की वाणी सुनने के लिए सारा नगर ही उमड़ पड़ा था | उनके व्यक्तित्व में एसा ही चुंबकीय आकर्षण है | एक अद्भुत सम्मोहन है उनमें | जो कि सभी के हृदय में अपना प्रभाव पैदा करता है | उन्होंने यहाँ कहा : " मित्रों ! मैं जागकर जीवन को देखने के लिए निवेदन करने आया हूँ | जगकर देखो ——— स्वयं में और स्वयं के बाहर भी | तो तुम पाओगे कि एक अनूठा रहस्य जगत तुम्हें घेरे हुए है | इसी रहस्य में प्रवेश धर्म है | ...(damaged)... में नहीं है धर्म | धर्म है जीवन के रहस्यानुभव में | अज्ञात की अनुभूति में है धर्म इसलिए
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उधार ज्ञान को छोड़ो और सरलता से जीवन को देखो | वह दर्शन तुम्हें उस ज्ञान पर ले जाएगा जो कि जीवन को सब बंधनों से मुक्त कर देता है | "
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" धर्म की ओर पहला कदम क्या है ? मानसिक गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ डालना | श्रद्धाओं, विश्वासों और अंधी कल्पनाओं से मुक्त हो जाना ही धर्म की ओर पहला कदम है | "
धुलिया में सत्संग
आचार्यश्री. 4 और 5 अक्तूबर के लिए धुलिया पधारे उन्होंने धुलिया में तीन जनसभाओं को संबोधित किया | धुलिया की विचारशील जनता में उनके विचारों से क्रांति की एक लहर फैल गई | जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण ही नया और मौलिक है | उनकी प्रत्येक बात उनकी अपनी ही अनुभूति से उत्पन्न है | फिर भी वे इतनी सरलता से प्रत्येक बात समझाते हैं कि वह सभी की समझ में आ जाती है | बूढ़े और बच्चे सभी उन्हें सुनकर आनंद मग्न हो जाते हैं | उन्होंने यहाँ कहा : " धर्म का श्रद्धा और विश्वास से संबंध अत्यंत घातक सिद्ध हुआ है | उनके कारण ही धर्म अंधविश्वास बन सका है और हज़ारों वर्षों से मनुष्य को अंधकार में रहना पड़ रहा है | विश्वास मानसिक अन्धेपन और गुलामी का ही दूसरा नाम है | और मानसिक रूप से गुलाम चेतना कैसे मुक्त हो सकती है ----- कैसे आनंद पा सकती है -------- कैसे आलोक को उपलब्ध हो सकती है ? इसलिए, मेरी दृष्टि में तो व्यक्ति की चेतना में धार्मिक क्रांति की शुरुआत अंधविश्वासों के सारे जाले तोड़ देने से ही शुरू होती है | धर्म की और वही पहला कदम है | "


" जीवन का संगीत है, संतुलन में | अतिवाद पीड़ा है, तनाव है | न शरीर, न आत्मा | न विज्ञान , न धर्म ---- वरन जीवन की समग्रता और पूर्णता पर एक सँस्कृति निर्मित करनी है | "
धुलिया महाविद्यालय में :
4 अक्तूबर की सुबह आचार्यश्री का आगमन धुलिया महाविद्यालय के विधयर्थीयों के बीच हुआ | विद्यार्थियों ने उनकी वाणी अभूतपूर्व शांति और तन्मयता से सुनी | आचार्यश्री ने यहाँ कहा : " धर्म भी अकेला अधूरा है और विज्ञान भी | शरीर और आत्मा के अद्भुत मिलन और संतुलन में जैसे मनुष्य का जीवन है एसे ही धर्म और विज्ञान के संतुलन से ही मनुष्य की पूर्ण संस्कृति का जन्म हो सकता है |अबतक की सारी सभ्यताएँ और संकृतियाँ अधूरी थीं | इससे ही उनमें मनुष्य का कल्याण भी नहीं हुआ | या तो वे शरीरवादी थीं या आत्मवादी | लेकिन ये दोनों अतियाँ हैं | और अति एक तनाव है | वह एक रोग हैं | वह एक पीड़ा है | जीवन का संगीत तो सदा संतुलन में है, मध्य में है, अति में नहीं , अनति में है | भविष्य में एक एसी ही पूर्ण संस्कृति को जन्म देना है | वह पूर्ण संस्कृति ही मनुष्यता को दुखों और पीड़ाओं के उपर उठा सकती है | "
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समाचार विभाग
धर्म चक्र प्रवर्तन :
आचार्यश्री के देशव्यापी कार्यक्रम
 
"सत्य का द्वार है शून्य | मिटो ताकि उसे पा सको | जो मिटते हैं, वे अमृत को पा लेते हैं |"
जबलपुर में विशाल जनसभा
11नवंबर की रात्रि में आचार्यश्री को सुनने के लिए हज़ारों नर-नारी लार्डगंज जैन मंदिर में इकट्ठे हुए थे | मंदिर के विशाल प्रांगण में एक इंच भर भी जगह खाली नहीं थी | मंदिर के बाहर भी सैकड़ों व्यक्ति मार्ग पर खड़े होकर उनकी वाणि सुन रहे थे | उन्हें सुनना भी एक आनुभव है | हृदय से जो शब्द आते हैं, वे हृदय तक पहुँच भी जाते हैं | एसे शब्दों को कान नहीं सुनते, प्राण भी सुन लेते हैं |
आचार्यश्री ने कहा : "सत्य और स्वयं के बीच अहंकार के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है | इसलिए ही जो स्वयं को खोता है, वही उसे पाता है | स्वयं को खोने के मूल्य पर ही परमात्मा पाया जाता है | साहस करो और मिट जाओ | मृत्यु तो मिटाएगी ही---क्या उसके पूर्व हम स्वयं ही अपने को नहीं खो सकते है? और जो अहंकार से शून्य हो जाता है फिर उसे मृत्यु भी मिटाने में असमर्थ हो जाती है क्योंकि अहंकार के धूएं के जाते ही उस आत्मा के दर्शन होते हैं, जिसकी कि कोई मृत्यु नहीं है |"
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"मित्र शांति के दर्पण बनो, ताकि परमात्मा का चंद्रमा तुममें प्रफुल्लित हो सके |"
बंबई, मलाड में साधना शिविर
20, 21 और 22 नवम्बर, आचार्यश्री के सान्निध्य में मलाड, बंबई में एक साधना शिविर हुआ | इस शिविर में बड़ी संख्या में साधकों ने भाग लिया | आचार्यश्री ने अविचार, विचार और निर्विचार पर तीन प्रवचन दिए | उन्होंने कहा : "जीवन अपनी पूर्णता में केवल उस चित्त के समक्ष प्रकट होता है, जो की निर्विचार को उपलब्ध हो जाता है | विचार की विक्षिप्त तरंगें चित्त को मौन और शून्य नहीं होने देती हैं, और जबतक चित्त मौन, शून्य और शांत नहीं है, तब तक वह एसा दर्पण नहीं बन पाता है, जो कि सत्य को प्रतिफलित कर सके | सत्य तो निकट है, लेकिन हम शांत नहीं हैं | पूर्णिमा का चाँद तो आकाश में है, लेकिन झील विलुप्त है, इसलिए उसे नहीं जान पा रही है | जैसे ही झील शांत होगी, चाँद उसके हृदयों के हृदय में विराजमान हो जावेगा | इसलिए, मैं कहता हूँ : मौन - मौन - मौन -----मौन हो जाओ ताकि तुम उसे सुन और जान सको जो की परमात्मा है | मित्र, उसे जानते ही जीवन एक आनंद, एक संगीत और एक सौन्दर्य बन जाता है |"
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"अहिंसा है आनंद का फल | और आनंद ? आनंद है आत्मज्ञान का आलोक |"
लायंस क्लब पूना में ----
आचार्यश्री 4 दिसंबर को लायंस क्लब पूना के वार्षिक अधिवेशन में प्रमुख अतिथियों के रूप में पधारे | इस अवसर पर उन्हें सुनने के लिए वृहत जन-समूह उपस्थित हुआ था | आचार्यश्री ने वहाँ कहा : "मनुष्यता आत्मघाती प्रवृतियों से पीड़ित है | 5 हज़ार वर्षों के छोटे से इतिहास में 1460486 युद्ध हुए हैं ! और उस युद्ध की तैयारी चल रही है जोकि मनुष्य जाति का ही नहीं, वरन जीवन-मात्र की पृथ्वी से समाप्ति बन सकता है | इस रुग्णता के मूल में क्या है? इसके मूल में है : आनंद का अभाव | दुखी व्यक्ति दूसरों को भी दुख देना चाहता है | बस यही एक सुख उसके जीवन में होता है | इससे ही हिंसा जन्मति है | और हिंसा के रस में वह स्वयं की भी आहुति दे सकता है | जीवन में आनंद हो तो ही अहिंसा हो सकती है | अहिंसा, प्रेम और करुणा आनंद से ही प्रवाहित होते हैं | हिंसा, घ्रिणा और क्रूरता दुख की संततीया हैं | इसलिए मैं चाहता हूँ कि मनुष्य के प्राणों में आनंद को संचालित करो, उसके चित्र को संगीतपूर्ण बनाओ, उसके हृदय को अल्हादित करो, इसके अतिरिक्त उसे बचाने का और कोई उपाय नहीं है | और यह कैसे होगा ? आनंद आत्मज्ञान का फल है | जो स्वयं को जान लेता है वह अनायास ही आनंद में यह करता है | स्वयं को जानते ही अंतस के सारे संताप वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे प्रकाश के आगमन से अंधकार विदा हो जाता है | वस्तुतः तो अंधकार की अपनी कोई सत्ता ही नहीं है | वह तो प्रकाश की अनुपस्थिति मात्र है | एसे ही दुख की भी अपनी सत्ता नहीं है | वह भी आत्मा-ज्ञान का अभाव है | और आत्मा है निकटतम | वही है हमारा होना | बस उसके प्रति जागरण ही भीतर के प्रति लाओ | मन के प्रति जागो | जागरण ---- सतत जागरण , अंततः उसके प्रति जगा देता है जो कि मैं हूँ | उसे जानते ही सब बदल जाता है | आलोक के साथ आग है आनंद, अति-आनंद के साथ ही आती है अहिंसा | अहिंसा उपर से नहीं थोपी जा सकती | वह तो आती है ---आनंद के पीछे आती है |"
"मैं कहता हूँ असंतोष ----- दिव्या असंतोष | क्योंकि वही परमात्मा का मार्ग है |"
विद्यार्थियों और युवकों के मध्‍य : पूना ----
आचार्यश्री ने 5 दिसंबर की रात्रि में पूना में युवकों और विद्यार्थियों की एक सभा को संबोधित किया | उन्होने कहा : " जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है | जो मिले हुए जीवन मे ही तृप्त हो जाता है, वह जीवन को पाने का अधिकार ही खो देता है | जीवन है एक सृजन --- सतत, अहिर्निश सृजन
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लायंस क्लब पूना में ----
आचार्यश्री 4 दिसंबर को लायंस क्लब पूना के अधिवेशन में मुख्य अतिथि की भाँति में पधारे | उन्होंने वहाँ कहा : "मनुष्यता हिंसा से पीड़ित है | 5 हज़ार वर्षों के इतिहास में 15 हज़ार युद्ध हुए हैं ! यह किस तथ्य की सूचना है ? इसीकि कि मनुष्य के भीतर से पशु अभी तक विदा नहीं हुआ है | और अब तो इस पशु के हाथों में बहुत संघारक अनु-अस्त्र आ गये हैं | इससे पूरी मनुष्य जाती के ही नष्ट हो जाने की संभावना पैदा हो गयी है |
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जीवन है एक कला ---एक शिल्प | और प्रत्येक है स्वयं अपना शिल्पी | जो मिला है जन्म से वह तो अनगढ़ पत्थर है | इसे प्रतिमा बनाना हमारे हाथों में है | इसलिए जो मिला है उससे संतुष्ट नहीं हो जाना | एसा संतोष तो मृत्‍यू बन जाता है | इसलिए मैं कहता हूँ असंतोष ---दिव्य असंतोष में जलो | मंज़िल के लिए ---आत्म-सृजन के लिए जो निरंतर असंतुष्ट है, केवल वही और केवल वही जीवन को इस विकास तक पहुँचा सकता है जिसका नाम परमात्मा है |"
"प्यास और प्यास और प्यास---क्योंकि प्यास ही अन्ततः प्राप्ति बन जाती है |"
अहमदनगर महाविद्यालय में सत्संग ----
आचार्यश्री अहमदनगर महाविद्यालय के आमन्त्रण पर 6,7 और 8 दिसंबर के लिए यहाँ पधारे | उन्होने महाविद्यालय में तीन प्रवचन दिए | विषय था : सत्य की खोज | उन्होनें कहा : "सत्य की खोज के लिए चाहिए ज्वलंत प्यास | एसी प्यास जो सत्य के अतिरिक्त और किसी भी चीज़ से तृप्त न हो | सिद्धांतों, शब्दों और शास्त्रों में जो तृप्त हो जाते हैं वे बहुतः प्यासे ही नहीं हैं | क्या वस्तुतः प्यास हो तो कोई पानी की बातों से तृप्त हो सकता है ? और प्यास गहरी होती जाय तो अंततः वही प्राप्ति बन जाती है क्योंकि जो सरोवर इसे बुझा सकता है, वह तो सदा तो है और साथ ही है | वह तो स्वयं के भीतर ही है |
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"स्वतन्त्र बनो | तोडो चित्त की ज़ंजीरों को| मुक्ति की प्रथम शर्त यही है |"
अहमदनगर जैन स्थानक में ----
आचर्यश्री 8 दिसंबर की प्रभात जैन स्थानक अहमदनगर में पधारे | उन्होंने वहाँ कहा : "परमात्मा की दिशा में सबसे बड़ी बाधा क्या है ? परतंत्रता--- पर्तन्त्र चित्त ही सबसे बड़ी बाधा है | चित्त को स्वतंत्र बनाओ ---शब्दों, सिद्धांतों और शास्त्रों की कारागृह से स्वयं को बाहर लाओ | मनुष्य स्वयं ही परंपराओं की कड़ियों में स्वयं को बाँधे है | और इन्हें तोड़े बिना सत्य के सागर में कोई गति नहीं हो सकती है | अज्ञात में जाने के लिए ज्ञात को छोड़ना ही पड़ता है |"
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"परमात्मा है प्रकाश की भांति। उसे जानने को चाहिए प्रज्ञा की आंखें।"
छिंदवाड़ा में जनसभा ---
आचार्यश्री १७ दिसम्बर को छिंदवाड़ा पधारे। एक विशाल जनसभा को उन्होंने संबोधित किया। इस सभा में उन्होंने कहाः "धर्म प्रकाश की भांति है। परमात्मा भी। उसे देखने को प्रज्ञा की आंखें चाहिए। अंधा आदमी प्रकाश के संबंध में विचार करे भी तो क्या करेगा ? वह तो प्रकाश की कोई भी धारणा नहीं बना सकताहै और जो भी कल्पना वह करेगा वह अनिवार्यतः गलत होगी। इसलिए विचार से न प्रकाश जाना जा सकताहै,न परमात्मा । निर्विचार की आंख हो तो ही परमात्मा है। विचार के उहापोह में ---विचार की विक्षिप्त तरंगों में आंखें बंद हैं। विचारों को विदा दे और देखें। निर्विचार मौन में जिसका प्रत्यक्ष होताहै, वही सत्य है, वही स्वयं की और सर्व की सत्ता है।"
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"विवेक को चुनौती दो ---संकट दो ताकि वह जाग सके। विश्वास तो विवेक की मृत्यु है।"
छिंदवाड़ा में विचार गोष्ठी --- १७ दिसम्बर की दोपहर में आचार्यश्री के सत्संग के लिए एक गोष्ठी आयोजित हुई। आचार्यश्री ने गोष्ठी में कहाः " मैं विश्वास में ही मनुष्य का अंधापन देखता हूँ। विश्वास नहीं, चाहिए विवेक। और विश्वास विवेक के जागरण में अवरोध बन जाताहै। जीवन की प्रसुप्त शक्तियां जागतीहै चुनौती से। और विश्वास उस चुनौती को व्यर्थ कर देते हैं, जोकि विवेक को जगाती है। विश्वास उन सत्यों को मान लेताहै, जिन्हें जानता नहीं। ऐसे मानने से स्वभावतः ही जानने की मात्रा रुक जाती है। जानना है तो न तो मानो, न न मानो। मन को 'हां ' या ' ना 'से मुक्त रखो और खोजो। विश्वास, अविश्वास दोनों से स्वयं को मुक्त रखकर जो खोजताहै, उसका विवेक इस चुनौती में ही जागृत होसकताहै। जहां न विश्वास है, न अविश्वास,वहां एक संकट उपस्थित होजाताहै और उसी संकट में विवेक जागता है। और विवेक है व्दार --- विवेक है मार्ग। जीवन में जो भी शुभ है, सुन्दर है और सत्य है वह सब उसीसे पाया जाताहै।"
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"सत्य है सीमाओं से मुक्त चित्त में। और वहीं है प्रेम। और प्रेम परमात्मा का मंदिर है।"
चौरई में जनसभा ---
आचार्यश्री १८ दिस. को यहां पधारे। सैकड़ों मुमुक्षु जन उन्हें सुनने को एकत्रित हुए। उन्होंने अमृतवाणी से कहाः "धर्मों में नहीं, धर्म में प्राण है। धर्मों ने ही तो धर्म के प्राण लेलियेहैं। हिंदू, जैन,ईसाई, बौद्ध, मुसलमान--- इन नामों ने ही सब उपद्रव कर दिया है। इन नामों के कारण ही --- इन देहों के कारण ही धर्म की आत्मा विस्मृत होगई है। मैं धार्मिक व्यक्ति का पहला लक्षण यही मानता हूँ कि वह किसी संप्रदाय और किसी सीमा में आबद्ध न होगा। वह तो सब सिमायें छोड़ देगा ताकि असीम को जान सके। सीमाओं सा बंधा चित्त असीम को कहीं जान सकता है। सत्य किसी विशेष में नहीं है और न परमात्मा है किसी चर्च या मंदिर में कैद है। सत्य तो है उस चित्त में जो सब सीमाओं से मुक्त है और परमात्मा है उस
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संत तरण तरण जयंती समारोह पर 17 दिसंबर को आयोजित विशाल जनसभा की अध्यक्षता आचार्यश्री ने की | उन्होने कहा : " धर्म एक है | इस एक धर्म को पैदा होने में --प्रकट होने में
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"मंदिर में जिसकी कि कोई दीवार नहीं | कौन सा है वह मंदिर | वह मंदिर है प्रेम का | प्रेम ही है वह मंदिर जो कि परमात्मा का है |"
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जबलपुर में तारण तरण जयंती पर सर्वधर्म सम्मेलन
19 दिसंबर
 
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"मैं विद्रोह का स्वागत करता हूँ लेकिन अंधे विद्रोह का नहीं, आँखवाले विद्रोह का |"
मंडला महाविद्यालय में ---
आचार्यश्री 21 दिसंबर को मंडला पधारे | उन्होंने महाविद्यालयके छात्रो को संबोधित किया | वे बोले : "विद्रोह की अग्नि जिस हृदय में नहीं है, वह हृदय मृत-माँस पिंड है | विद्रोह ही जीवन है और विद्रोह ही है विकास | लेकिन एसा विद्रोह वहीं होता है जहाँ विवेक होता है | विवेकशून्य विद्रोह आत्मघात बन जाता है | और विवेक से युक्त विद्रोह है सृजन की उर्जा | विवेक को जगाओ और विद्रोही बनो | विवेक है ही विद्रोह की शक्ति | उस विद्रोह ने मनुष्य के बंधन तोड़े | उसकी मानसिक गुलामी तोड़ी | अतीत के मृत बोझ जला डालो | लेकिन स्मरण रहे कि यदि विवेक न हुआ तो तुम स्वयं को ही जला डालोगे | और एसा ही हो रहा है | जिस शक्ति से युवक एक नये समाज का निर्माण कर सकते हैं, वे उससे स्वयं को ही अपंग किए ले रहे हैं | मैं तो विद्रोह का स्वागत करता हूँ, लेकिन अंधे विद्रोह का नहीं, आँखवाले विद्रोह का | अँधा विद्रोह एक अति से दूसरी अति पर ले जाता है | वह कुएँ से निकालकर खाई में गिरना है | जबकि जीवन का विकास है मध्‍य में | आँखें हो तो ही हम मध्य के स्वर्णपथ पर हो सकते हैं |"
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चिकलदरा में साधना शिविर
26, 27, 28 दिस.
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"शुभ के बीज बोओ। छोटे ही सही। लेकिन कल वे ही मनुष्य की बगिया को सुवासित फूलों से भर देंगे।"
परतवाड़ा में विशाल जन सभा --
आचार्य श्री २९ दिस. को परतवाड़ा,एलिचपुर पधारे। उनके स्वागत में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई। इस सभा को संबोधित करते हुए उनहोंने कहाः "मनुष्य हजारों वर्षों से दुख और पीड़ा में जीरहा है। निश्चित ही उसके जीवन के बुनियादी आधार गलत हैं। शिक्षा भूल भरी है। संस्कृति रुग्ण है और सभ्यता सभ्यता ही नहीं है। उसके जीवन का केन्द्र है, प्रेम नहीं, प्रतिस्पर्धा । मूलतः ईर्ष्या पर ही वह अपना भवन बनाता है। यह ऐसे है है जैसे कोई अग्नि की लपटों में ही रहने का प्रयास करे ! और छोटे छोटे बच्चों को भी हम महत्वाकांक्षा सिखाते हैं। जबकि समस्त आनंद का आधार है गैर महत्वाकांक्षी चित्त। क्या यह नहीं हो सकताहै कि हम बच्चों को महत्वाकांक्षा के ज्वर में दीक्षित न करें ? हम उन्हें अहंकार की शिक्षा न दें ? हम उन्हें ईर्ष्या के बिष से दीक्षित न करें ? यह होसकता है। मित्रो, मैं कहता हूँ कि यह होसकता है क्योंकि स्वभावतः हम दुख को नहीं, आनंद को ही चाहते हैं, घृणा को नहीं, प्रेम को ही चाहते हैं, अशांति को नहीं, शांति को ही चाहते हैं। मनुष्य स्वभावतः शुभ का, सत्य का और सुन्दर का आकांक्षी है। उसे सम्यक् दिशा मिले तो वह निश्चय ही पृथ्वी पर ही स्वर्ग बना सकताहै। नर्क तो हमने बनाकर देख ही लिया है। अब स्वर्ग भी बनाकर देखें। लेकिन यह कार्य कोई किसी अन्य पर नहीं छोड़ सकताहै। प्रत्येक को ही यह करना होगा। संसार को नर्क बनाने में आपका जो सहयोग है उससे अपने हाथ खींचलें और चाहे कितनी ही छोटी शक्ति हो सुन्दर के लिए सत्य के मूल्य में उसे लगायें। और स्मरण रखें कि आज बोये गये फूलों के छोटे छोटे बीज कल मनुष्य की बगिया को सुगंध से भरे फूलों की मुस्कुराहट से भर सकते हैं। "
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जबलपुर में विश्व मैत्री संघ की संगोष्ठी
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१ जन.
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"जीवन के अर्थ को जानना है ?तो चलो निर्विचार समाधी में। उसके अतिरिक्त सब व्यर्थ है।"
जालना में सत्संग --
आचार्य श्री ३,४,५,६ जन. को जालना पधारे। उनके सानिध्य मे जालना में वैचारिक क्रांति की लहर ही फ़ैल गईं। उन्होंने वहां कहाः "विश्वासों को विचार के अस्त्र से छिन्न-भिन्न करदो। और फिर विचार को भी निर्विचार से विदा देदो। और तब जो शेष रह जाताहै, वही सत्य है। निर्विचार समाधि में ही पूर्ण जीवन के प्रति आंखें खुलती हैं। और यह आंखों का खुलना
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व्यक्ति को एक बिल्कुल ही अभिनव लोक में प्रतिष्ठा दे देता है। उस अज्ञात लोक को जाने बिना न तो जीवन में अर्थ है और न अभिप्राय। उसे जानकर अर्थ उपलब्ध होता है और कृतार्थता आदि धन्यता का अनुभव होताहै।"
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"सत्य को जानना यानी स्वयं में होना। तीन स्वर्ण-सूत्रः शांति, सरलता और शून्यता।"


गुजरात विश्वविद्दालय, अहमदाबाद में --
आचार्यश्री. १६, १७ जन. गुजरात विश्वविद्दालय के आमंत्रण पर अहमदाबाद पधारे। १६ जन. को उन्होंने अपने प्रथम भाषण में 'विज्ञान और धर्म' पर विचार प्रगट किये। और १७ जन. को अंतिम भाषण में 'जीवन-सत्य की खोज' पर। उन्होंने कहाः " सत्य को जानने का मार्ग विचार नहीं है। विचार तो स्वयं से दूर लेजाताहै। स्वयं में परिपूर्णतया होना ही सत्य को जानना है। उस भांति ही सत्य से संबंध होता है। स्वयं में होने के लिए तीन स्वर्णसूत्रः हैं : शांति, सरलता और शून्यता। चित्त शांत, सरल और शून्य हो तो सत्य के प्रति बंद आंखें अनायास ही खुल जाती हैं। और सत्य की अनुभूति सबकुछ बदल देती है -- दृष्टी, जीवन,गंतव्य। सत्य को जाने बिना न जीवन में अर्थ है, न आनंद है, न धन्यताहै।"
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"चित्त की परम स्वतंतत्रताही परमात्मा को पाने की पात्रता है।"
गुजरात विद्दापीठ, अहमदाबाद. में --
आचार्यश्री. १६ जन.की प्रभात गुजरात विद्दापीठ पधारे। उन्होंने अपने प्रवचन में विद्दार्थीयों को 'मौलिक चिंतना' और 'मानसिक स्वतंतत्रता 'के लिए प्रेरणा दी। उन्होंने कहाः " परमात्मा का व्दार उनके लिए सदा से बंद है जो कि मानसिक रूप से परतंत्र हैं। यह परतंत्रता है विश्वासों की, परंपराओं की, पक्षपातों की। स्वतंत्र चित्त विश्वासों के अंधकार में नहीं,विवेक के आलोक से केंद्रित होताहै। विवेक ही स्वतंत्रताहै। इसलिए उधार विश्वासों से तृप्त मत होना। विश्वास से अज्ञान मिटता नहीं, बस छिप जाताहै। अज्ञान की मृत्यु के लिए तो जगाना होता है स्वयं के विवेक को। विवेक प्रकाश में आके स्वतंत्रता में प्रतिष्ठा देता है। और ऐसे प्रतिष्ठा देता है। और ऐसी प्रतिष्ठा ही परमात्मा को जानने और पाने की पात्रताहै।"
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"चित्त का निरीक्षण -- सतत निरिक्षण ही आत्मा पर ले जाता है। और वहीँ परमात्मा है।"
सागर क्रांति मंडल, अहमदाबाद में --
आचार्य श्री. १७ जन. की प्रभात सागर क्रांति मंडल के युवको के मध्य पधारे। उन्होंने उन्हें संबोधित करके कहाः "मैं आत्मज्ञान के अतिरिक्त जीवन में आनंद और आलोक का कोई मार्ग नहीं होता है। वस्तुतः आत्मज्ञान ही ज्ञान है -- शेष सब तो अज्ञान है।
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आत्मज्ञान अपरोक्ष ज्ञान है। उसके लिए तो बस स्वयं का सम्यक् निरीक्षण चाहिए। चित्त के निरीक्षण से -- सतत निरीक्षण से क्रमशः उसका बोध अवतरित होता है जो कि चित्त की उर्मियों के पीछे छिपा है। चित्त की वही पृष्ठ्भूमि आत्मा है। और उसे जान लेना जीवन के समस्त को जान लेना है। और उसे जान लेना मृत्यु का अतिक्रमण है। मृत्यु सत्य प्रतीत होती है क्योंकि जीवन का बोध नहीं है। जहां जीवन जाना जाता है, वहां मृत्यु नहीं है। और वही वह है जो परमात्मा है।"
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"राग भी नहीं, विराग भी नहीं। मंगलदायी तो है वीतरागता।"
माटुंगा, बम्बई में जनसभा --
आचार्यश्री. १८ जन. को बम्बई पधारे। माटुंगा में एक पहली सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहाः "जीवन-विनाश की दो अतियां है -- राग और विराग, भोग और त्याग। दोनों ही असंयम हैं, असंतुलन हैं। संयम और संतुलन तोहै वीतराग-चित्तता में। वह तीसरी ही दिशा है। दिशा नहीं, वस्तुतः वह तो आत्मस्थिति है। चित्त, उस दिशा में ही चलें। वही शुभ है। वही मंगलदायी है। राग भी बाहरहै। विराग भी। विराग तो राग की ही प्रतिक्रिया है। वह तो उसका ही शीर्षासन करता रूप है। राग से विराग पर जाना कुयें से बच खाई में गिरनाहै। इसलिए राग पर हों तो वीतराग की ओर चलें। विराग पर हो तो वीतराग की ओर चलें। जहां भी हो वहीँ से वीतरागता की ओर गति करें। वीतरागता की ओर गति का उपकरण क्या है ? उपकरण हैः जागरूकता। अमूर्च्छा। सजगता। जीवन में -- शरीर के तल पर या मन के तल पर -- कुछ भी मूर्छित न हो। जो भी हो होशपूर्वक हो -- स्मृति पूर्वक हो। सम्यक् स्मृति क्रमशः व्दन्व्दों के पार उठा देती है। वह वहां पहुँचा देती है जहां स्वयं की सत्ताहै। और उस सत्ता का बोध ही मुक्ति ले आताहै। उसमें जाग जाना ही मोक्ष है। वही आलोकहै। वही आनंद है। वही अमृत है। वही वह है जो कि अनादि है और अनंत है।"
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समाचार विभाग
धर्म चक्र प्रवर्तन :
आचार्यश्री के देशव्यापी कार्यक्रम
"खोजो स्वतंत्रता | और फिर स्वतंत्र चित्त में सत्य चला आता है, जैसे सागर में सरिताओं का गिरना|"
श्रीरामपुर में सत्संग
आचार्यश्री 4, 5 और 6 फ़रवरी के लिए श्रीरामपुर पधारे | ये तीन दिन श्रीरामपुर के प्रबुद्ध नागरिकों के लिए अविस्मरणीय हो गये हैं | आचार्यश्री ने यहाँ कहा : "सत्य के मार्ग की यात्रा केवल वे ही कर सकते हैं, जो की स्वतन्त्र हैं | स्वतन्त्र चित्त ---समस्त परंपराओं, संस्कारों और विचारों से स्‍वतंत्र चित्त ही वस्तुतः वह मार्ग है, जो की सत्य तक ले जाता है | स्वतंत्रता ही सत्य का द्वार है | स्वतंत्रता ही सत्य है | इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य मत खोजो | सत्य तो स्वतः आता है | खोजो स्वतंत्रता | लेकिन हम तो .परतंत्रता खोजते हैं और साथ ही सत्य भी चाहते हैं | यह असंभव है, एसा कभी नहीं हो सकता है | क्योंकि, जहाँ स्वतंत्रता ही नहीं है, वहाँ तो अज्ञात की यात्रा ही प्रारंभ नहीं होती है | परतन्त्र चित्त यानी ज्ञात से बँधा चित्त | स्वतन्त्र चित्त यानी ज्ञात से मुक्त चित्त | और निश्चय ही जो ज्ञात से बँधा है, वह अज्ञात को कैसे जान सकता है ? जबकि सत्य अज्ञात है और परमात्मा अज्ञात है | अज्ञात को पाने के लिए ज्ञात को छोड्ना पड़ता है | और यही है सबसे बड़ा साहस | क्योंकि ज्ञात मैं सुरक्षा है | क्योंकि ज्ञात परिचित है और अज्ञात अपरिचित | इसी परिचय और इसी सुरक्षा के कारण मनुष्य स्वयं ही अपनी ज़ंजीरों को मजबूत करता रहता है | जबकि चाहिए मजबूती फिर अपरिचित और अनजान में प्रवेश का साहस | एसा साहस की साधना बनता है | फिर एसे साहसी व्यक्ति को ही में धार्मिक कहता हूँ | साहस करो, स्वतंत्र बनो फिर सत्य को पा लो | सत्य तो सदा द्वार पर खड़ा है, लेकिन हममें आँखें खोलकर उसे देखने का साहस ही नहीं है | परमात्मा तो निकट है, लेकिन हम स्वयं की निर्मित परतंत्रताओं में ही बँधे हैं फिर उसकी ओर एक इंच भी यात्रा करने में असमर्थ हैं |"
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"स्वयं से भागो नहीं जागो। क्योंकि भागने से जो स्वयं में शून्य है, वही जागने से पूर्ण बन जाता है।"
बारामती में प्रवचन
आचार्यश्री ७ फरवरी को बारामती पधारे। ७ फरवरी की सुबह उन्होंने नागरिकों की एक सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहाः "मनुष्य के जीवन की मूल समस्या क्या है? वह पहेली कौनसी है, जिसमें उलझकर अधिक लोग व्यर्थ ही समाप्त होजाते है? और जो इस मूल समस्या को बिना जाने ही जीवनपथ पर चल पड़ताहै, निश्चय ही वह यदि भटक जाता हो तो कोई आश्चर्य नहीं है। और दुर्भाग्य से अधिक लोग जीवनभर भागते हैं, दौड़ते हैं, और गिरते हैं और समाप्त भी हो जातेहैं, बिना यह जाने कि वे क्यों दौड़ रहे थे और क्या कर रहे थे। क्या आपको उस मूल समस्या का बोध है? क्या आप उसके प्रति सचेत है? नहीं। नहीं। जरा भी नहीं। अन्यथा आप दुखी न होते, अन्यथा आप जीवन को एक बोझ की भांति न ढोते। क्योंकि जो उस समस्या को जान लेता है, वह उसे हल भी कर लेताहै। उसे ठीक से जान लेना ही उसका समाधान भी है। वह समस्या यह है कि मनुष्य स्वयं को भरने और पूरा करने के लिए दौड़ रहा है। मनुष्य पाता है कि वह भीतर खाली और रिक्त है। एक अभाव उसे स्वयं के प्राणों में अनुभव होता है। इस अभाव को, हम रिक्तता और अकेलेपन को भरने के लिए ही वह दौड़ता फिरताहै। धन की, यश की, पद की,सारी खोजें इसी अभाव के भरने के लिए हैं। लेकिन सब पाकर भी पाया जाताहै कि वह खाली का खाली है। और यही विफलता----यही अनिवार्य विफलता उसे जीते जी मुर्दा बना देती है। यह विफलता अनिवार्य है क्योंकि अभाव है उसके भीतर और जिससे उसे वह भरना चाहताहै, वह सब है उसके बाहर। और आंतरिक रिक्तता बाह्य संपदा से कैसे भर सकती है? इसलिए बाहर संपत्ति का ढेर लग जाताहै और भीतर की विपत्ति उससे अछूती ही रह जाती है। और संपदा के ढेर में भी मनुष्य स्वयं को दरिद्र ही पाता है। यह विफलता मनुष्य को त्याग और तप आदि कर्म की ओर भी लेजासकती है। लेकिन वे भी बाहर ही हैं और वे भी व्यर्थ हैं। वस्तुतः सवाल कही धन में,
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या धर्म में भागने का नहीं है | सवाल है स्वयं में जागने का | अभाव क्या है ?---- रिक्तता क्या है ?------यह स्वयं में जो शून्यता है, वह क्या है ? इसे जाने बिना जो मानता है , वह तो बाहर ही भागेगा क्योंकि वह तो भीतर से भयभीत जो है | यहि उसकी मती, गति स्वयं से पलायन ही होगी | जबकि स्वयं से कोई कैसे भाग सकता है ? स्वयं का होना यदि शून्यता भी है तो भी उससे भागा नहीं जा सकता है | वह जो भी है, वही है | उससे भागना असंभव होता है | क्योंकि, स्वयं के प्रति जागते ही पाया जाता है कि जो शून्य जैसा प्रतीत होता था , वह तो पूर्ण है | पूर्ण के प्रति जिद्द हो तो वह शून्य है, यदि शून्य के प्रति भरेंगे तो वही पूर्ण है | शून्य और पूर्ण एक ही सत्य के दो अनुभव हैं | निद्रा में पूर्ण शून्य मालूम होता है और जागरण में शून्य पूर्ण हो जाता है |"
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"आत्मघात या आत्मक्रांति -----मनुष्यता के लिए उपस्थित बस ये दो ही विकल्प हैं|"
बारामति साइंस कालेज में उदबोधन
7 फ़रवरी की दोपहर आचार्यश्री ने बारामति साइंस कालेज के विद्यार्थियों को संबोधित किया | उन्होंने कहा : "मनुष्य का अतीत अत्यंत हिंसा, क्रूरता आदि अज्ञान से भरा रहा है | 5 हज़ार वर्षों में 15 हज़ार युद्ध हुए हैं | और आश्चर्य तो यह है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण अतीत से हमने अबतक कोई भी सीख नहीं ली है | मनुष्य वैसा का वैसा ही है | उसमें कोई मौलिक क्रांति नहीं हुई है | लेकिन अब या तो मनुष्य को आमूलतः बदलना होगा या मनुष्य की जाति ही नष्ट हो जाएगी क्योंकि विज्ञान ने एसी शक्ति उसके हाथों में रख दी है कि वह हिंसक रहकर आज आत्मघात से नहीं बच सकता है | आत्मघात या आत्मक्रांति---बस आज ये दो ही विकल्प मनुष्यता के लिए हैं | आत्मक्रांति से मेरा क्या अर्थ है ? शरीर के तल पर मनुष्य ने भलीभाँति जीकर देख लिया है | इस जीवन में दुख के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है | और इस जीवन की पुर्णाहुति होती है, मृत्यु में | और स्मरण रहे कि जो दुख में जीता है और मृत्यु में समाप्त होता है, वह दूसरों के लिए भी दुख बन जाता है, और मृत्यु बन जाता है | इससे ही इतनी हिंसा हैं, इतने युद्ध हैं, इतनी शत्रुता है | शरीर में ही जीवन को समाप्त मान लेने का यह स्वाभाविक परिणाम है | लेकिन एक और जीवन भी है | आत्मा का जीवन भी है | जो स्वयं की चेतना के केंद्र को खोजता है ओर उसे पाकर उसके लिए मृत्यु नहीं है | उसे न जानने से ही मृत्यु का भ्रम पैदा होता है | और जो उसे जान लेता है उसके लिए फिर मृत्यु मिट जाती है | निश्चय ही उसे जानना समस्त दुखों और पीड़ाओं के उपर उठ जाना है क्योंकि वह भोक्ता नहीं है | वह तो बस ज्ञाता है | और जो स्वयं दुख के बाहर हो जाता है, वह किसी को भी दुख देने में असमर्थ हो जाता है | एसी चित्त की दशा ही अहिंसा है | उससे तो प्रेम बहता है क्योंकि वह प्रेम है | उससे तो आनंद बहता है क्योंकि वह आनंद है | उससे तो अमृत बहता है क्योंकि वह अमृत है |”
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8 फ़रवरी दोपहर कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर में प्रवचन
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मंडला में विशाल जनसभा
आचार्यश्री 21 फ़रवरी की संध्या मंडला पधारे | रात को उन्होंने एक विशाल जनसभा को संबोधित किया | उन्होंने कहा : "मैं प्रेम के अतिरिक्त और किसी प्रार्थना को नहीं जानता हूँ | और मै कहता हूँ कि जो प्रेम में समग्रतः प्रविष्ट हो जाते हैं, वे परमात्मा को भी पा लेते हैं | लेकिन प्रेम को पाने के लिए स्वयं को खोना पड़ता है | क्योंकि अह्न्कार की चट्टान के अतिरिक्त प्रेम के झरने को रोकने में और क्या बाधा है ? प्रेम तो प्रत्येक के हृदय में भरा है, लेकिन अहंकार द्वार को रोके हुए है | अहंकार को छोड़ो यदि प्रेम को पाना है तो | और प्रेम तो आवश्यक है यदि परमात्मा को पाना है | अहंकार अंधकार है | परमात्मा आलोक | अहंकार परतंत्रता है | परमात्मा स्वतंत्रता है | और अहंकार से, अंधकार से, परतंत्रता से जो परमात्मा तक, प्रकाश तक, परममुक्ति तक जाना चाहता है, उसके लिए मार्ग क्या है ? उसके लिए प्रेम मार्ग है | प्रेम और प्रेम और प्रेम | प्रेम ही जीवन है | प्रेम ही प्रार्थना | और अंततः प्रेम ही परमात्मा है | लेकिन हम प्रार्थनाएँ भी करते हैं, और परमात्मा के मंदिरों में मनुष्य निर्मित मंदिरों की परिक्रमाएँ भी करते हैं, पर प्रेम में हमारे हृदय बिल्कुल शून्य हैं | इसलिए न हमारी प्रार्थनाओं का कोई मूल्य है और न हमारे परमात्माओं का | उल्टे वे और भी मनुष्य को मनुष्य से तोड़ते जाने का कारण बन गये हैं | और क्या जो मनुष्य को मनुष्य से ही तोड़ देता हो, वह कभी उसे परमात्मा से भी जोड़ सकता है ? प्रेम के अतिरिक्त और कोई कर्म नहीं है | क्योंकि प्रेम के अतिरिक्त स्वयं और समग्र के बीच और कोई सेतु नहीं है | प्रार्थनाएँ छोड़ो
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और प्रेम करो | परमात्मा को छोड़ो और प्रेम करो | और अंततः पाओगे कि प्रार्थना पूरी हो गयी है और परमात्मा स्वयम् ही उपलब्ध हो गया है |”
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"ज्ञान के लिए पराए ज्ञान से मुक्ति आवश्यक | क्योंकि जो स्वयं का नहीं, वस्तुतः वह ज्ञान ही नहीं है |"
आणंद में प्रवचन
आचार्यश्री 3 मार्च को आणंद पधारे | आणंद के प्रबुद्ध नागरिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा : "सत्य शब्दों से नहीं पाया जा सकता है | इसलिए वह किसी और से भी नहीं पाया जा सकता है | सत्य है स्वानुभूति | उसे तो स्वयं में और स्वयम् ही जानने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है | लेकिन हम सत्य को खोजते हैं, शास्त्रों में, शब्दों और सिद्धांतों में | और इस भाँति पाया गया ज्ञान, ज्ञान तो नहीं बनता, विपरीत ज्ञान के लिए अवरोध बन जाता है | क्योंकि जो व्यक्ति जितना अधिक तथाकथित ज्ञान से आबद्ध हो जाता है, वह उतना ही स्वयं के ज्ञान को पाने में असमर्थ हो जाता है | वह दिशा ही उसे विस्मृत हो जाती है | वह उधार और पराए ज्ञान को अपना मानकर ही तृप्त हो जाता है, इसलिए उसके स्वयं के ज्ञान की मौलिक शांति के जागने का अवसर ही खो जाता है | वह स्मृति के और स्मृति में संगृहीत सूचनाओं को ही ज्ञान मान लेता है और परीणाम स्‍वरूप सदा के लिए ही उस ज्ञान से वंचित रह जाता है जो की ज्ञान है | इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य की खोज में सबसे पहले तो यही है कि इस ज्ञान से मुक्त हो जावें जो कि हमारा नहीं है | क्योंकि तभी हमारी खोज ज्ञान के उस आयाम में प्रारम्भ होती है जो कि स्वयं में ही सोया हुआ है | और वहीं, उसी आलोक में जो की स्वयं की चेतना से अवीरभूत होता है, सत्य है और वही परमात्मा है |"
"विचार को जगाओ | और विश्वासों से बचो | क्योंकि विश्वास अन्धेपन में ले जाते हैं|"
सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद में प्रवचन
आचार्यश्री ने 3 मार्च की दोपहर सरदार वल्लभभाई पटेल विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच अपने विचार प्रकट किए | उन्होंने कहा : "विचार को जगाओ | सम्यक तर्क को जगाओ | और विश्वास से बचो | क्योंकि विश्वास अन्धेपन में ले जाता है | मनुष्य
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के दुर्भाग्य की सारी कथा उसके अंधे विश्वासों के अभाव में घटित नहीं हो सकती | और स्मरण रहे कि विश्वास मात्र अंधे होते हैं | फिर वे विश्वास चाहे आस्तीकों के हों चाहे नास्तीकों के | मैं तुमसे निवेदन करता हूँ कि तुम विश्वासों से अपने को मत खोजना | क्योंकि जो विश्वासों में बँध जाता है, उसकी खोज निष्फल और निर्दोष नहीं हो पाती है और वह सत्य को जानने में असमर्थ हो जाता है | और सत्य को जाने बिना, पाए बिना न जीवन में अर्थ है, न अभिप्राय है, न आनंद है | इसलिए सदा अपने चित्त को निष्पक्ष रखना और मन के द्वार खुले रखना और अपनी जिग्यासा को सचेत और जीवंत रखना ताकि एक दिन तुम उसे जान सको जो कि समस्त जीवन का मूल है और उसे जानकर् और पाकर उस धन्यता और कृतार्थता को पा सको जिसे पाने के लिए ही प्रत्येक व्यक्ति जन्मता है लेकिन जिसे बहुत थोड़े से लोग ही उपलब्ध हो पाते हैं | क्योंकि अधिक लोग विश्वासों से बँध जाते हैं और निष्फल खोज कि कमियों को खोजते हैं जिनके अभाव में सत्य के दर्शन होने असंभव हैं | विश्वास नहीं, विवेक----यदि यही तुम्हारी यात्रा की दिशा बन सकी तो तुम निश्चय ही उसे जान पाओगे जो कि सत्य है, जो की परमात्मा है | सत्य ही परमात्मा है | उसके अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है | और सत्य को पाने का मार्ग विवेक है |"
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"मिटो ताकि पा सको | मनुष्य जहाँ नहीं है, मन जहाँ नहीं है, वहीं वह है, 'जो है' |"
अहमदाबाद में सत्संग
आचार्यश्री के सान्निध्य में 4, 5, 6 मार्च को एक विशाल सत्संग का आयोजन यहाँ हुआ | इस सत्संग से एक क्रांति की लहर ही पैदा हो गई | आचार्या श्री ने प्रवचन दिए | उन्होंने कहा : "धर्मों में धर्म नहीं है | और जिसे धर्म को पाना है, उसे धर्मों से मुक्त होना पड़ता है | धर्म तो एक है क्योंकि सत्य एक है | और इस सत्य को पाने के लिए सत्य के संबंध में प्रचारित और स्वीकृत सारी धारणाएँ छोड़नी आवश्यक हैं | जो उन धारणाओं को लेकर चलता है, वह सत्य को नहीं, बस अपनी धारणाओं के ही अनुभव को उपलब्ध होता है | निश्चय ही वैसी अनुभूतियाँ स्वयं की मनोकल्पनाओं से ज़्यादा नहीं होती है | और कल्पनाएं करने में मनुष्य का मन खूब समर्थ है | प्रकार प्रकार के ईश्वर इसी मन से पैदा होते हैं | लेकिन 'जो है' उसे जानने में एसा मन असमर्थ हो जाता है | तथाकथित धार्मिक लोग इसीलिए कभी सत्य को नहीं जान पाते हैं | क्योंकि वे स्वयं को गढ़ने में जो संलग्न होते हैं | एसे गृह-निर्मित सत्यों के कारण ही धर्मों का नाश हो गया है | जबकि धर्म में प्रवेश के लिए सत्यों के घड़ने का यह गृह-उद्योग बिल्कुल ही बंद करना होता है | मन जब सबभाँति धारणा शून्य, विचारों से रिक्त और कल्पनों से मुक्त होता है, तभी वह जाना जाता है, जो है | वही है सत्य | वही है परमात्मा | और उसे जानना ही मुक्ति है | निश्चय ही स्वयं सत्य को नहीं घड़ना है, बल्कि स्वयं को मिटाना है ताकि सत्य प्रकट हो सके | और तब चित्त धारणाओं और विचारों और कल्पनाओं से शून्य होता है तो मिट ही जाता है | इस नकारात्मक दशा में ही सत्य जाना जाता है | मन की कोई भी विधायक क्रिया उसे पाने में बाधा है | मनुष्य सत्य को नहीं पा सकता है | हाँ, जहाँ वह नहीं है, वहीं सत्य प्रकट है |“
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12 मार्च विश्व मैत्री मंच गोष्ठी जबलपुर (रेड टिक)
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"ईश्वर मर गया है | और अब उस ईश्वर को खोजना है, जो न जन्मता है, और न मरता है|" - क्रास कर दिया गया |
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"ईश्वर मर गया है | मनुष्यनिर्मित ईश्वर मर गया है | और उस ईश्वर को खोजना है, जो कि मनुष्य निर्मित नहीं है, और न कभी जन्मता है और न कभी मरता है |"
बंबई में विराट सत्संग
आचार्यश्री के सान्निध्य में एक विराट सत्संग का आयोजन 20,21,.22,23 मार्च को यहाँ आयोजित हुआ | हज़ारों लोगों ने इस सत्संग में आचार्यश्री की अमृतवाणी को सुना | आचार्यश्री ने कहा : "मैं एक खबर लाया हूँ कि ईश्वर मर गया है | लेकिन घबडाएं नहीं और न हीं शोक मनाएँ, क्योंकि जो ईश्वर मर गया है, वह मनुष्य निर्मित ही था | और यह शुभ ही है कि वह मर गया है क्योंकि उसके कारण ही मनुष्य उस ईश्वर को जानने से वंचित था जिसका कि न जन्म है और न मृत्यु है | जीवन, अस्तित्व, जो है, वह अपनी समग्रता में ही तो ईश्वर है | लेकिन मनुष्य ने अपनी अपनी कल्पना से हज़ारों छोटे बड़े ईश्वर घड़ रखे थे | वे धीरे धीरे मरते गये हैं और अब वह मंदिर खाली पड़ा है जो कि उनसे बुरी तरह भरा हुआ था | इस खाली मंदिर में----इस खाली मन में ---- इस शून्य में अब उस सत्य को पाया और जिया जा सकता है जिसकी कि कोई भी कल्पना संभव नहीं है | ईश्वर हमारी कल्पना नहीं है, और जो हमारी कल्पना है वह ईश्वर नहीं है | उसे जानने को तो सारी कल्पना को विदा दे देनी अनिवार्य है | कल्पना की प्रतिमाएँ जबतक चित्त को घेरे रहती है तबतक वह जो निराकार है, कैसे माना जा सकता है ? लेकिन जैसे ही आकारों और रूपों को विदा दी जाती है, वैसे ही पाया जाता है कि वह तो है----वह तो सदा से है |"
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२९ मार्च | सिंधी समाज जबलपुर में प्रेम दिवस (रेड टिक)
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"भय से धर्म का क्या संबंध ? धर्म तो वहीं है जहाँ अभय है |"
हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में,
आचार्यश्री 1,2, 3 अप्रेल हैदराबाद, साधनाश्रम में पधारे | हैदराबाद आते ही पत्रकार सम्मेलन को उन्होंने संबोधित किया | उन्होंने कहा : "मनुष्य के मन को सब भाँति के भयों से मुक्त करना है | भय से बड़ी और कोई जानलेवा बीमारी नहीं है | इस भय के कारण ही धर्म के नाम पर मनुष्य का अतिशय शोषण हुआ है | जबकि वस्तुतः भय और धर्म विरोधी दिशा में हैं | धर्म का भय से क्या संबंध ? धर्म तो वहीं है जहाँ अभय है |"
"धर्म कहाँ है ? तीर्थों में ? नहीं | मंदिरों में ? नहीं | संगठनों में ? --संप्रदायों में ? नहीं | धर्म तो वहाँ है जहाँ हम उसे खोजते ही नहीं हैं | वह तो स्वयं में है |"
हैदराबाद में सत्संग
आचार्यश्री के सान्निध्य में आयोजित सत्संग से हैदराबाद की जनता में एक अत्यंत विचारोत्तेजक भावदशा निर्मित हुई | उनके शब्द तो अग्नि की भाँति हैं, जो कि जलाते भी हैं और निखारते भी हैं | उन्होंने यहाँ कहा : "धर्म का हाल धर्मों के कारण हुआ है | मनुष्य को धर्मों ने जोड़ा नहीं है उल्टे तोड़ा है | उन्होंने बात तो प्रेम क़ि करी लेकिन घृणा के संगठन खड़े किए हैं | वस्तुतः संगठन या संप्रदाय के पीछे घृणा और हिंसा ही होती है | धर्म का संगठन से कोई संबंध नहीं है | धर्म संगठन नहीं है | धर्म साधना है | और इसलिए धर्म अत्यंत वैयक्तिक है | व्यक्ति जितना भी स्वयं में प्रविष्ठ होता है, उतना ही वह धर्म के सत्य को जानता और अनुभव करता है | स्वयं की अत्यंतिक निजता में ही धर्म का सत्य उपल्बध होता है | इसलिए संगठनों में धर्म को मत खोजो | वह तो निज के एकांत और मौन में है | इसलिए भीड़ और समूह में उसे मत खोजो | वह तो स्वयं में ही है | शांत होकर उसे स्वयं में देखोगे तो पाओगे कि उसकी ज्योति तो निरंतर भीतर जल रही है | वह न मंदिरों में है, न तीर्थों में | वह तो वहाँ छिपा है जहाँ कि हम उसे खोजते ही नहीं हैं | वह तो स्वयं में ही छिपा है |”
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"जीवन जो जियो | उसकी समग्रता में | क्योंकि वहीं वह अवसर है जहाँ स्वयं में वो ...वह जागता है और जीवंत बनता है |"
सिकंदराबाद में प्रवचन
आचार्यश्री ने 2 अप्रेल की प्रभात सिकंदराबाद की जनता को संबोधित किया | उन्होंने कहा :"जीवन अखंड है | उसे खंड खंड बाँटना अत्यंत भ्रामक है | धर्म जीवन विरोधी नहीं है | और जो जीवन विरोधी है, वह धर्म नहीं है | इसलिए मैं समग्र जीवन को ही साधना मानता हूँ | जो साधना जीवन से भागकर ही होती है, वह साधना नहीं, जीवन से पलायन है | और पलायन कंज़ोरी है | फ़ि पलायन में, भागने से क्या कभी कोई समस्या हाल होती है? समस्या को और उसकी चुनौती को जो सामने से स्वीकार नहीं करता है, वह तो उसमें और भी उलझा होता है | भय से भागना पैदा होता है और भागने से और भय बढ़ता है | एसए एक दुश्चक्र पैदा हो जाता है | जबकि चित्त शांत हो और समग्र भाव से जीवन की समस्या का अवलोकन करता है तो पाया जाता है कि समस्या है ही नहीं | वह थी हमारी मूर्छा में | जागरण में वह वैसे ही नहीं ..जाती है, जैसे कि सूर्य के आने पर अंधकार नहीं पाया जाता है | जीवन को जियो | उसकी पूर्णता में जीवन को जियो | जागृत और अमूर्छित जीवन को स्वीकार करो | उससे भागते नहीं |क्योंकि वहीं वह अवसर है जहाँ स्वयम् में जो सोया है, वह जाग सकता है |"
 
"अहंकार चाहते हो तो आनंद न चाहो | क्योंकि, दोनों को एक ही साथ नहीं पाया जा सकता है |"
कटनी में संगोष्ठी
आचार्यश्री के सत्संग के लिए 9 अप्रेल को कटनी के प्रबुद्ध नागरिकों की एक संगोष्ठी हुई | आचार्यश्री नेसंगोष्ठीमें कहा:"अहंकार दुख है | अहंकार पीड़ा है | अहंकार अंधकार है | लेकिन हम उसमें ही जीते हैं और इसीलिए न तो हम जीवन को जान पाते हैं और न सत्य को, न सौंदर्य को, न शांति को | अहन्कार कारागृह है | और उस कारागृह में सूर्य का आलोक नहीं पहुँचता है | लेकिन हम आलोक भी चाहते हैं, आनंद भी चाहते हैं और अहंकार के कारागृह की दीवारों को उँचा भी उठाए जाते हैं | क्या यह विरोधाभास आपको दिखाई नहीं पड़ता है? इस विरोधाभास के दिखाई पड़ते ही जीवन में एक क्रांति हो जाती है | क्योंकि कोई भी व्यक्ति यदि विरोधाभास को देखले फिर विरोधी दिशाओं में एक
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ही साथ नहीं जी सकता है |”
 
"सरिताओं के सागर को पाने का रहस्य क्या है ? वही परमात्मा को पाने का रहस्य भी है |"
कटनी में प्रवचन
9 अप्रेल की रात्रि आचार्यश्री ने एक विशाल जनसभा को यहाँ संबोधित किया | उन्होंनें कहा : "परमात्मा को पाने या खोजने मंदिरों में जो जाता है, उसे पता नहीं कि परमात्मा वहाँ नहीं है | मनुष्य द्वारा निर्मित मंदिर इतने छोटे हैं कि परमात्मा उनमें कैसे समा सकता है ? उसे पाना हो तो मंदिरों की, और मनों की सारी दीवारें गिरा देनी आवश्यक हैं | मन का मंदिर जहाँ दीवारों से मुक्त हो सकता वहीं परमात्मा है | मनुष्य मिटता है तभी उसे पाता है | सरिताओं के सागर को पाने का जो रहस्य है, परमात्मा को पाने का रहस्य भी वही है |"
"मैं शून्य सिखाता हूँ | क्योंकि शून्य में ही व्यक्ति वहाँ होता है, जहाँ कि वस्तुतः वह है |"
शारदाग्राम, जूनागढ़ में साधना शिविर
आचार्यश्री 14, 15, 16 अप्रेल को सौराष्ट्र पधारे | उनके सन्निद्य में एक साधनाशिविर शारदाग्राम में आयोजित हुआ | 250 साधक और साधिकाएँ तीन दिवस उनके अमृत सहवास में रहे | जीवन में आमूल क्रांति कैसे हो, इस संबंध में आचार्य श्री ने उनका मार्गदर्शन किया | उनके शब्द-शब्‍द में मौलिक दृष्टि है और उनके इशारे-इशारे में अदृश्य और अज्ञात सत्य की और इंगित है | उनके साथ होना एक अनुठा अनुभव है | उनकी आँखें वह सब भी कहती हुई मालूम होती है जो कि शब्द नहीं कह पाते हैं | उन्होंने यहाँ कहा : "मैं मौन सिखाता हूँ | मैं शून्य सिखाता हूँ | क्योंकि, शून्य में ही व्यक्ति वहाँ होता है जहाँ की वस्तुतः वह है | वह केंद्र ही परमात्मा है |"
"मैं कौन हूँ ? पूछो ---- स्वयम् से पूछो | और पूछते ही मानो तो एकदिन अवश्य ही वह उत्तर उपलब्ध होता है जो कि जुम्मेदारी है|"
पूना में सत्संग
आचार्यश्री 22, 23, 24 अप्रेल को पूना पधारे | यहाँ उन्होंने तीन प्रवचन दिए | इन प्रवचनों में सैकड़ों लोग उपस्थित हुए और आनंदित हुए| आचार्यश्री को सुनना एक अभूतपूर्व आनंद है |
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उन्हें तो सुनो सुनते-सुनते ही जैसे चेतना किसी और ही लोक में चली जाती है | उन्हें सुनना मात्र सुनना नहीं, वरन स्वयं में एक यात्रा भी है | उन्होंने यहाँ कहा : "मैं कौन हूँ? हम प्राथमिक प्रश्न का उत्तर ही जिसके साथ नहीं है, उनके जीवन में कोई भी अर्थ कैसे हो सकता है ? और जिनके पास इस प्रश्न के उत्तर और सीखे हुए उत्तर है, उनकी स्थिति तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण है | क्योंकि, उन्होंने स्वयं के सत्य का तो कोई अनुभव है ही नहीं, उल्टे उत्तरों को सीख लेने के कारण उनकी खोज भी अवरुद्ध हो जाती है | सत्य को तो स्वयम् के श्रम से ही खोजना और स्वयं में ही खोदना पड़ता है | उस खोज की पहली शर्त है किसी अन्य का उत्तर किसी भी शर्त किसी भी मूल्य पर स्वीकार न करना | यदि प्रश्न हो और उत्तर ना हों, तो वह प्रश्न ही एक तीर की भाँति स्वयम् में गहरे जाने का मार्ग बन जाता है | और यदि अनथक उस प्रश्न के साथ जीया जावे तो एक दिन वह उस उत्तर को खोज ही निकालता है वो तो स्वयं में ही प्रसुप्त और प्रच्छन्न है | एसा ज्ञान ही केवल ज्ञान है जो की स्वयम् में ही अविर्भूत होता है | उसके अतिरिक्त शेष सब अज्ञान है जो की स्वयम् को छिपाने के लिए ज्ञान के वस्त्र पहने होता है |"
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२८ अप्रेल | नवीन विद्यभवन जबलपुर में शिक्षा साप्ताह का समापन भाषण |
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२९ अप्रेल | जीवन जागृति केंद्र जबलपुर की संगोष्ठी
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