Letter written on 13 Jan 1971 (YPrem)

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Osho wrote many letters in Hindi to Ma Yoga Prem which were published in various letter collections. This one is dated 13th January 1971 and was published in Antarveena (अंतर्वीणा) as letter #147.

Letterhead reads:

acharya rajneesh on top in lower-case
A-1 WOODLAND PEDDAR ROAD BOMBAY-26 PHONE : 382184 in ALL-CAPS

Logo in the upper right corner is a "standard" Jeevan Jagriti Kendra logo in two colours. The whole letter is written in black ink except for a bright blue-purple signature.

acharya rajneesh

A-1 WOODLAND PEDDAR ROAD BOMBAY-26 PHONE 382184

प्रिय योग प्रेम,
प्रेम। एक अद् भुत गुरु था -- सोईची (Shoichi)।

उसने जिस दिन से तोफुकू (Tofuku)मंदिर में शिक्षण देना शुरू किया; उसीदिन से मंदिर का रूपांतरण होगया।

दिन आता--दिन जाता।

रात आती--रात जाती।

लेकिन, तोफुकू मंदिर सदा मौन ही खड़ा रहता।

वह मंदिर एक गहन सन्नाटा हो गया।

उस मंदिर से जरा-सी भी आवाज न उठती।

शास्त्रों से सूत्रों का पाठ भी बंद होगया।

प्रार्थना-पूजा बंद हो गई।

यहां तक कि मंदिर के घंटे भी सदा सोये रहते -- उन्हें भी कोई न छेड़ता।

क्योंकि, सोईची के शिष्यों को सिवाय ध्यान के और कुछ भी न करना था।

और फिर बरसों तक ऐसा ही रहा।

लोग भी भूल गये कि पड़ौस में कोई मंदिर है।

और सैकड़ों सन्यासी थे वहां।

और बड़ी गतिविधि थी।

लेकिन, मौन और शून्य।

बड़ी बड़ी घटनायें वहां घटती थीं।

आत्मज्ञान के दियें जलते थे।

समाधी के फूल खिलते थे।

लेकिन, मौन और शून्य।

और फिर एक दिन लोगों ने सुना कि मंदिर के घंटे बज रहे हैं और शास्त्रों से सूत्र पढ़े जारहे हैं -- यह कैसी अनहोनी ?

लोग भागे मंदिर की ओर।

सारा नगर व्दार पर इकठ्ठा हो गया।

सोईची ने संसार छोड़ दिया था।

उसके शव के पास ही शास्त्रों से सूत्र पढ़े जारहे थे !

और उसके शव के ऊपर ही घंटे बजाये जा रहे थे !

लोग चकित थे; लेकिन मैं सोचता हूँ कि यह ठीक ही है क्योंकि जबतक कोई मंदिर जीवित होता है तो मौन होता है।

रजनीश के प्रणाम

१३/१/१९७१

Letter-Jan-13-1971-Yprem.jpg
See also
Antarveena ~ 147 - The event of this letter.