Letter written on 12 May 1964

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This letter was typed on plain paper in Jabalpur on 12th May 1964 and addressed to Rajendranath Tripathi, who worked for the Life Insurance Corp of India in Bombay, after starting with them in Nagpur. It is one of four letters known to have been written to him.

The salutation appears to be "Chidatman", which can also be seen in another typed letter from May 1964. The letter is signed with "Rajneesh ke pranaam", both written and typed. It is not known to have been previously published.

There is a typed "Rajneesh" on top in place of letterhead, the style of which varies from the other letter in May mentioned above in that the typed "Rajneesh" is in red rather than black and is underscored by a series of Hindi keyboard characters not known in Western keyboards.

The envelope belonging to the letter is underneath. On the envelope can be seen a series of lines in the address, one of which is in red, as if for emphasis. It reads, "Jeevan Kendra", or "Life Center". This could plausibly be a particular section of Life Insurance Corp of India's operation. But it is also two of the three words of Osho's org at the time, Jeevan Jagriti Kendra, so perhaps Osho was smiling when he did this.

Other letters to RN Tripathi:

Letter written on 28 Sep 1963
Letter written on 10 Jan 1964
Letter written on 3 Sep 1963

रजनीश


चिदात्मन्,
स्नेह. कल संध्या आपका पत्र मिला है. मैं बम्बई में बहुत प्रतीक्षा करता रहा, फिर सोचा शायद आप अभी गांव से वापिस नहीं लौटे हैं. संभव है कि मैं जून के अंत में बम्बई होता-हुआ अहमदाबाद जाऊ,तब आपसे मिलना हो सकेगा.अच्छा होता कि गांव से लौटते समय यहां मुझे मिलते गये होते. जीवन में बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे सानिध्य से ही कहां जासकता है, और शब्द उसे नहीं कह पाते हैं. और, आश्चर्य तो यह है कि जो नहीं कहा जासकता है, वही मात्र कहने योग्य है, और जो कहा जासकता है, उसे यदि न भी कहा जावे तो कोई हानि नहीं होती है.

ज्ञान के प्रकाश में शब्द अंधेरे की भांति होजाते हैं. जो दीखता है,वह बोल तक उतरने को राजी नहीं होता है. वह मौन से तो बोलता है, पर मुखरता में मौन होजाता है, यह कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन मौन से अभिव्यक्ति के प्रगाढतम रूप की तरह भी परिचय होना है. आज शब्द तो निष्प्राण होगये हैं. उनसे कुछ भी संवादित होता नहीं मालुम होता है.कहकर भी लगता नहीं कि उनसे कुछ कहा जाता है.

स्व की गहराइयों में जो दीख रहा है,उसे तो मौन से और प्रेम से ही कहा जासकता है.

यह जानकर भी पहली बार बहुत आश्चर्य हुआ था कि प्रेम में ही मौन चरम होता है, और प्रेम की ही उस आत्यंतिक और चरम निशब्दता में सत्य संवादित होता है.

शब्द विवाद हैः निशब्दता संवाद है.

शब्द बुद्धि है, विचार हैः निशब्दता आत्मा है, समाधि हैं.

और, समाधि प्रेम है,क्योंकि उसी में कोई पराया नहीं है. और जहां कोई पराया नहीं है, वहीँ मिलन है, वहीँ संबंध है और वहीँ सवांद है.वहां कुछ कहना नहीं होता है और कह दिया जाता है, क्योंकि बीच में दीवार नहीं, व्दार होता है. यह द्वार आधुनिक मनुष्य ने खोदिया है,इसलिए आज विचार तो बहुत हैं, पर समझ बिल्कुल नहीं है. प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे से टूट गया है, और प्रत्येक एक दूसरे को गलत समझता है. यह एक दूसरे को ना समझने और गलत समझ का युग (age of misunderstanding) है.

मैं उस तल पर कुछ कहना चाहता हूं, जहां संवादित सत्य विकृत नहीं होता है, और उसकी गूंज मात्र ही अर्थ के फूल खिला देती है.

यह संभव है और सदा ही संभव रहा है.

पर उसका मार्ग शब्द नहीं शून्य है, और उसकी विधि बोलना नहीं, प्रेम है.

++++

प्रभु आनन्द दे यही कामना है.

अपरान्हः १२:५:१९६४
योगेश भवन
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर.मध्य प्रदेश.

रजनीश के प्रणाम

Letter-12-May-1964.jpg

श्री० राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी,
जूनियर आफीसर, ऐड० ट्रेनिंग. डिपार्टमेंट,
जीवन विमा निगम सेन्ट्रल आफिस,
जीवन केन्द्र,
बम्बई,१.

Envelope-12-May-1964.jpg


See also
Letters to Rajendranath Tripathi ~ 04 - The event of this letter.